Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 947

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- प्रयोगो भार्गवः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣यं꣡ यथा꣢꣯ न आ꣣भु꣢व꣣त्त्व꣡ष्टा꣢ रू꣣पे꣢व꣣ त꣡क्ष्या꣢ । अ꣣स्य꣢꣫ क्रत्वा꣣ य꣡श꣢स्वतः ॥९४७॥

अ꣣य꣢म् । य꣡था꣢꣯ । नः꣣ । आ꣣भु꣡व꣢त् । आ꣣ । भु꣡व꣢꣯त् । त्व꣡ष्टा꣢꣯ । रू꣣पा꣢ । इ꣣व । त꣡क्ष्या꣢꣯ । अ꣣स्य꣢ । क्र꣡त्वा꣢꣯ । य꣡श꣢꣯स्वतः ॥९४७॥

Mantra without Swara
अयं यथा न आभुवत्त्वष्टा रूपेव तक्ष्या । अस्य क्रत्वा यशस्वतः ॥

अयम् । यथा । नः । आभुवत् । आ । भुवत् । त्वष्टा । रूपा । इव । तक्ष्या । अस्य । क्रत्वा । यशस्वतः ॥९४७॥

Samveda - Mantra Number : 947
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
पूर्व मन्त्र से “अग्नि” की अनुवृत्ति है (अस्य) इस (यशस्वतः) यशस्वी अग्नि के (क्रत्वा) यजन से (अयम्) यह अग्नि (नः) हमारे लिये (तक्ष्या) फाड़ने योग्य (रूपा) काष्ठादि रूपों को (इव) जैसे (त्वष्टा) बढ़ई (यथा) जैसे (आभुवत्) होवे, वैसा हम यत्न करें॥
हमको अग्नि द्वारा ऐसा यज्ञ करना चाहिये कि यह अग्नि काष्ठों को बढ़ई के समान दुर्गन्ध का छेदन-भेदन करके उपकारक हो।
Footnote
ऋ० ८। १०२। ८ में भी॥