Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 944

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- प्रतर्दनो दैवोदासिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ब्र꣣ह्मा꣢ दे꣣वा꣡नां꣢ पद꣣वीः꣡ क꣢वी꣣नां꣢꣫ ऋषि꣣र्वि꣡प्रा꣢णां महि꣣षो꣢ मृ꣣गा꣡णा꣢म् । श्ये꣣नो꣡ गृध्रा꣢꣯णा꣣ꣳ स्व꣡धि꣢ति꣣र्व꣡ना꣢ना꣣ꣳ सो꣡मः꣢ प꣣वि꣢त्र꣣म꣡त्ये꣢ति꣣ रे꣡भ꣢न् ॥९४४॥

ब्र꣣ह्मा꣡ । दे꣣वा꣡ना꣢म् । प꣣दवीः꣢ । प꣣द । वीः꣢ । क꣣वीना꣢म् । ऋ꣡षिः꣢꣯ । वि꣡प्रा꣢꣯णाम् । वि । प्रा꣣णाम् । महिषः꣢ । मृ꣣गा꣡णा꣢म् । श्ये꣣नः꣢ । गृ꣡ध्रा꣢꣯णाम् । स्व꣡धि꣢꣯तिः । स्व । धि꣣तिः । व꣡ना꣢꣯नाम् । सो꣡मः꣢꣯ । प꣣वि꣡त्र꣢म् । अ꣡ति꣢꣯ । ए꣣ति । रे꣡भ꣢꣯न् ॥९४४॥

Mantra without Swara
ब्रह्मा देवानां पदवीः कवीनां ऋषिर्विप्राणां महिषो मृगाणाम् । श्येनो गृध्राणाꣳ स्वधितिर्वनानाꣳ सोमः पवित्रमत्येति रेभन् ॥

ब्रह्मा । देवानाम् । पदवीः । पद । वीः । कवीनाम् । ऋषिः । विप्राणाम् । वि । प्राणाम् । महिषः । मृगाणाम् । श्येनः । गृध्राणाम् । स्वधितिः । स्व । धितिः । वनानाम् । सोमः । पवित्रम् । अति । एति । रेभन् ॥९४४॥

Samveda - Mantra Number : 944
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(सोमः) ओषधिराज सोम (देवानाम्) विद्वान् ऋत्विजों में (ब्रह्मा) ब्रह्मा या मुख्य वा राजा है, तथा (कवीनाम्) कवियों का (पदवीः) ठीक-ठीक पद जुड़वाने वाला और (विप्राणाम्) बुद्धिमानों का (ऋषिः) दर्शक वा बुद्धिवर्धक है, तथा (मृगाणाम्) वन्य पशुओं का (महिषः) बढ़ाने वाला है, अथ च (गृध्राणाम्) गिद्धों और गृध्रोपलक्षित अन्य पक्षियों का (श्येनः) गतिसंपादक है। इस प्रकार के प्रभाव वाला सोम (रेभन्) शब्द करता हुआ (पवित्रम्) ऊर्णामय दशा पवित्र को (अत्येति) लांघता है।
निरुक्त के परिशिष्टकार इस ऋचा को इस प्रकार व्याख्यात करते हैं—
(भावार्थ :) — “यह सोम दिव्य सूर्यकिरणों का ब्रह्मा है, यही कवि = कविवत् आचरण करते हुए सूर्यकिरणों का पदयोजक है, यही व्यापक सूर्य किरणों का ऋषि = ज्ञापक है, यही ढूंढने वाले सूर्य किरणों का बढ़ाने वाला है, यही मानो सूर्य है, यह ठहराने वाले सूर्यकिरणों का सूर्य हैं, यही संविभाग करने वाले सूर्यकिरणों का कर्म में प्रेरक है। यही सोमकिरणों में पवित्रता फैलाने वाला है यह सोम की स्तुति प्रशंसा है”। यह भौतिक देवत पक्ष का अर्थ है॥
अब अध्यात्मपक्ष का अर्थ कहते हैं कि यह आत्मा सोम है, जो दिव्यकर्मा, इन्द्रियों का ब्रह्मा है, यह कवि इन्द्रियों का पदरचना सहायक है, वह व्यापक इन्द्रियों का बोध सहायक है, वह ढूंढ़ने वाले इन्द्रियों का बढ़ाने वाला है, यह बोधक इन्द्रियों का आत्मा है, वह विभाजक इन्द्रियों का कर्म कराने वाला है, वह इन्द्रियों का पावन, इन्द्रियों को लांघकर चला जाता है। वह सबका अनुभव करता है। इस प्रकार आत्मिक गति कहते हैं॥ नि० प० २। १३॥
Footnote
ऋ० ९। ९६। ६ में भी॥