Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 94

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- सोमाहुतिर्भार्गवः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
द꣣धन्वे꣢ वा꣣ य꣢दी꣣म꣢नु꣣ वो꣢च꣣द्ब्र꣢꣫ह्मेति꣣ वे꣢रु꣣ त꣢त् । प꣢रि꣣ वि꣡श्वा꣢नि꣣ का꣡व्या꣢ ने꣣मि꣢श्च꣣क्र꣡मि꣢वाभुवत् ॥९४॥

द꣣धन्वे꣢ । वा꣣ । य꣢त् । ई꣣म् । अ꣡नु꣢꣯ । वो꣡च꣢꣯त् । ब्र꣡ह्म꣢꣯ । इ꣡ति꣢꣯ । वेः । उ꣣ । त꣢त् । प꣡रि꣢꣯ । वि꣡श्वा꣢꣯नि꣣ । का꣡व्या꣢꣯ । ने꣣मिः꣢ । च꣣क्र꣢म् इ꣣व । अभुवत् ॥९४॥

Mantra without Swara
दधन्वे वा यदीमनु वोचद्ब्रह्मेति वेरु तत् । परि विश्वानि काव्या नेमिश्चक्रमिवाभुवत् ॥

दधन्वे । वा । यत् । ईम् । अनु । वोचत् । ब्रह्म । इति । वेः । उ । तत् । परि । विश्वानि । काव्या । नेमिः । चक्रम् इव । अभुवत् ॥९४॥

Samveda - Mantra Number : 94
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 10;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(ब्रह्म) वेद की (वोचत्) बोलता [होता] (वा) निश्चय करके (यत्) जिस [हव्यादि] को (ईम, अनु) इस अग्नि को, लक्ष्य करके (दधन्वे) धारण करता है [अध्वर्यु]। (तत्) उस [हव्य] को (इति) ऐसी रीति से धारण करना चाहिये [जिससे वह अग्नि] (वेः, उ) व्याप ही जावे। तथा (विश्वानि) समस्त (काव्या) ऋत्विजों के दिये हव्यों को (परि, अभुवत्) सब ओर से घेर लेवे। दृष्टान्त—(नेमिः) रथ के पहिये की पुट्ठी [परिधि] (चक्रमिव) पहिये को जैसे॥
अर्थात् जब होता वेदमन्त्र पढ़ता और अध्वर्यु अग्नि में हव्य चढ़ाता है तब इस प्रकार चढ़ाना चाहिये कि चारों ओर काष्ठों में प्रज्वलित अग्नि रहे जैसे कि रथ के पहिये की पुट्ठी रहती है और बीच में हय छोड़ा जावे जिससे तत्काल अग्नि उस में व्याप सके और द्युलोक को ले जा सके॥
यहाँ आग्नेय पर्व के प्रकरण से अग्नि पद की अनुवृत्ति है।
Footnote
निघं० ४।२ इत्यादि के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋग्वेद २।५।३ में “ब्रह्मेति” के स्थान में “ब्रह्म” और “अभुवत्” के स्थान में “अभवत्” इतना पाठभेद है॥