Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 934

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- पुरुहन्मा आङ्गिरसः Chhand- प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
इ꣢न्द्रं꣣ त꣡ꣳ शु꣢म्भ पुरुहन्म꣣न्न꣡व꣢से꣣ य꣡स्य꣢ द्वि꣣ता꣡ वि꣢ध꣣र्त्त꣡रि꣢ । ह꣡स्ते꣢न꣣ व꣢ज्रः꣣ प्र꣡ति꣢ धायि दर्श꣣तो꣢ म꣣हा꣢न् दे꣣वो꣡ न सूर्यः꣢꣯ ॥९३४॥

इ꣡न्द्र꣢꣯म् । तम् । शु꣣म्भ । पुरुहन्मन् । पुरु । हन्मन् । अ꣡व꣢꣯से । य꣡स्य꣢꣯ । द्वि꣣ता꣢ । वि꣣ध꣡र्तरि꣢ । वि꣣ । धर्त꣡रि꣢ । ह꣡स्ते꣢꣯न । व꣡ज्रः꣢꣯ । प्र꣡ति꣢꣯ । धा꣣यि । दर्श꣢तः । म꣣हा꣢न् । दे꣣वः꣢ । न । सू꣡र्यः꣢꣯ ॥९३४॥

Mantra without Swara
इन्द्रं तꣳ शुम्भ पुरुहन्मन्नवसे यस्य द्विता विधर्त्तरि । हस्तेन वज्रः प्रति धायि दर्शतो महान् देवो न सूर्यः ॥

इन्द्रम् । तम् । शुम्भ । पुरुहन्मन् । पुरु । हन्मन् । अवसे । यस्य । द्विता । विधर्तरि । वि । धर्तरि । हस्तेन । वज्रः । प्रति । धायि । दर्शतः । महान् । देवः । न । सूर्यः ॥९३४॥

Samveda - Mantra Number : 934
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(पुरुहन्मम्) हे बहुज्ञानिन् ! (तम्) उस (इन्द्रम्) इन्द्र = राजा को (अवसे) रक्षा के लिये (शुम्भ) प्रसन्न कर (यस्य) जिसके (हस्तेन) हाथ से (वज्रः) शस्त्राऽस्त्र समूह (प्रतिधायि) धारण किया है [इस से उग्र है] और जो (दर्शतः) दर्शनीय भी है [इससे अभिगम्य है] इस प्रकार राजा (महान्) बड़े (देवः) देव (सूर्यः) सूर्य के (न) समान (विषर्त्तरि) ब्रह्माण्ड में (द्विता) दो प्रकार से वर्त्तमान है॥
जैसे सूर्य तीक्ष्ण किरणों वाला होने से अधृष्य है और प्रकाशादि का उपयोगी होने से दर्शनीय और अभिगम्य है। इसी प्रकार राजा भी दुष्टों के दमनार्थ उग्न और धर्मात्माओं की रक्षार्थ शान्त दर्शनीय अभिगम्य होवे। उक्त गुणविशिष्ट राजा का विद्वानों को सत्कार करना चाहिये॥
Footnote
ऋ० ८। ७। २ के पाठान्तर संस्कृतभाष्य में देखिये॥