Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 925

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- बृहन्मतिराङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ꣡ योनि꣢꣯मरु꣣णो꣡ रु꣢ह꣣द्ग꣢म꣣दि꣢न्द्रो꣣ वृ꣡षा꣢ सु꣣त꣢म् । ध्रु꣣वे꣡ सद꣢꣯सि सीदतु ॥९२५॥

आ । यो꣡नि꣢꣯म् । अ꣣रुणः꣢ । रु꣣हत् । ग꣡म꣢꣯त् । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । वृ꣡षा꣢꣯ । सु꣣त꣢म् । ध्रु꣣वे꣢ । स꣡द꣢꣯सि । सी꣡द꣢꣯तु ॥९२५॥

Mantra without Swara
आ योनिमरुणो रुहद्गमदिन्द्रो वृषा सुतम् । ध्रुवे सदसि सीदतु ॥

आ । योनिम् । अरुणः । रुहत् । गमत् । इन्द्रः । वृषा । सुतम् । ध्रुवे । सदसि । सीदतु ॥९२५॥

Samveda - Mantra Number : 925
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अरुणः) रक्तवर्णं सोम (योनिम्) अपने स्थान को (आरुहत्) चढ़े और (ध्रुवे) स्थिर स्थान (सदसि) आकाश में (सीदतु) स्थिर होवे। इस प्रकार (इन्द्रः) वृष्टिकारक वायु विशेष वा विद्युत् विशेष (सुतम्) सोम को (गमत्) प्राप्त हो॥
Footnote
ऋ० ९। ४०। २ का पाठान्तर संस्कृतभाष्य में देखिये। यहां भी सायण भाष्य में ऋग्वेद के “सीदति” पाठ की व्याख्या है। सामवेद के “सीदतु” की नहीं॥