Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 923

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- सप्तर्षयः Chhand- प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
त꣢वा꣣हं꣡ नक्त꣢꣯मु꣣त꣡ सो꣢म ते꣣ दि꣡वा꣢ दुहा꣣नो꣡ ब꣢भ्र꣣ ऊ꣡ध꣢नि । घृ꣣णा꣡ तप꣢꣯न्त꣣म꣢ति꣣ सू꣡र्यं꣢ प꣣रः꣡ श꣢कु꣣ना꣡ इ꣢व पप्तिम ॥९२३॥

त꣡व꣢꣯ । अ꣡ह꣢म् । न꣡क्त꣢꣯म् । उ꣣त꣢ । सो꣣म । ते । दि꣡वा꣢꣯ । दु꣣हानः꣢ । ब꣣भ्रो । ऊ꣡ध꣢꣯नि । घृ꣣णा꣢ । त꣡प꣢꣯न्तम् । अ꣡ति꣢꣯ । सू꣡र्य꣢꣯म् । प꣣रः꣢ । श꣣कुनाः꣢ । इ꣣व । पप्तिम ॥९२३॥

Mantra without Swara
तवाहं नक्तमुत सोम ते दिवा दुहानो बभ्र ऊधनि । घृणा तपन्तमति सूर्यं परः शकुना इव पप्तिम ॥

तव । अहम् । नक्तम् । उत । सोम । ते । दिवा । दुहानः । बभ्रो । ऊधनि । घृणा । तपन्तम् । अति । सूर्यम् । परः । शकुनाः । इव । पप्तिम ॥९२३॥

Samveda - Mantra Number : 923
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(सोम) हे शान्तिदायक ! (बभ्रो) हे विश्वम्भर ! विष्णो ! (ऊधनि) गौवों के बाख में (दुहानः) दोहन करते हुए अर्थात् प्रातः काल और (दिवा) दिन में (उत) तथा (नक्तम्) रात्रि में (अहम्) हम लोग (तव, ते) तेरी ही तेरी [उपासना करें] और (घृणा) दीप्ति से (सूर्यम्) सूर्य को (अति) उल्लंघित करके (तपन्तम्) प्रकाशमान (परः) सबसे परे [आप] को (पप्तिम) होवें (इव) जैसे (शकुनाः) पक्षिगण [सूर्य वा प्रकाश की ओर अपनी शक्ति के अनुसार उड़ते हैं, तद्वत्]॥
तात्पर्य यह है कि हम प्रातः काल उठकर, दिन में और रात्रि में परमात्मा के अतिरिक्त अन्य की उसके स्थान में उपासना न करें। यद्यपि वह अनन्त अचिन्त्य और अप्रमेय से हमें सर्वात्मरूप से प्राप्त नहीं हो सकता तथापि जैसे पक्षी सूर्य वा आकाश की ओर वहां तक उड़ते हैं, जहां तक उनके पंखों का बल है, वैसे ही हम को अपनी अल्प शक्ति भी समस्त रूप से परमात्मा के भजन में लगा देनी चाहिये। वह अनन्त तेजस्वी सूर्यादि का भी प्रकाशक है इस लिये हम को जो उसके भक्त हैं कृतार्थ करेगा॥
Footnote
सायणाचार्य ने इस मन्त्र के “दुहानः” पद के स्थान में “सख्याय” पद की व्याख्या की है और जहां तक देखने को मिले किसी पुस्तक के मूल से यहाँ तक कि सायणभाष्य युक्त पुस्तकों के भी मूल में “सख्याय” पाठान्तर नहीं पाया जाता। अनुमान होता है कि ऋ० ९। १०७। २० में जो “सख्याय” पद है उसी की व्याख्या यहाँ सायणभाष्य में है न कि सामवेदस्थ पाठ की। हम ने अन्यत्र भी बहुधा साम के सायणभाष्य में यह छिद्र देखा है॥