Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 921

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- दृढच्युत आगस्त्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प꣡व꣢मान धि꣣या꣢ हि꣣तो꣡३ऽभि꣢꣫ योनिं꣣ क꣡नि꣢क्रदत् । ध꣡र्म꣢णा वा꣣यु꣢मारु꣢꣯हः ॥९२१॥

प꣡व꣢꣯मान । धि꣣या꣢ । हि꣣तः꣢ । अ꣣भि꣢ । यो꣡नि꣢꣯म् । क꣡नि꣢꣯क्रदत् । ध꣡र्म꣢꣯णा । वा꣣यु꣢म् । आ । अ꣣रुहः ॥९२१॥

Mantra without Swara
पवमान धिया हितो३ऽभि योनिं कनिक्रदत् । धर्मणा वायुमारुहः ॥

पवमान । धिया । हितः । अभि । योनिम् । कनिक्रदत् । धर्मणा । वायुम् । आ । अरुहः ॥९२१॥

Samveda - Mantra Number : 921
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(पवमान) सोम ! (धिया) कर्म से (हितः) हितकर हो (योनिम्) अपने स्थान को (अभि) लक्ष्य करके (कनिक्रदत्) शब्द करता हुआ (धर्मणा) अपने स्वभाव से (वायुम) वायु मण्डल पर (आरुहः) चढ़॥
अर्थात् यज्ञकर्म में हितकारी सोम शब्द करता हुआ स्वभावानुसार वा मण्डल पर चढ़ जाता है॥
Footnote
ऋ० ९। २५। २ का पाठान्तर संस्कृतभाष्य में देखिये॥