Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 92

1875 Mantra
Devata- अङ्गिराः Rishi- वामदेव: कश्यप:, असितो देवलो वा Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
इ꣣त꣢ ए꣣त꣢ उ꣣दा꣡रु꣢हन्दि꣣वः꣢ पृ꣣ष्ठा꣡न्या रु꣢꣯हन् । प्र꣢ भू꣣र्ज꣢यो꣣ य꣡था꣢ प꣣थो꣡द्यामङ्गि꣢꣯रसो ययुः ॥९२

इ꣣तः꣢ । ए꣣ते꣢ । उ꣣दा꣢रु꣢हन् । उ꣣त् । आ꣡रु꣢꣯हन् । दि꣣वः꣢ । पृ꣣ष्ठा꣡नि꣢ । आ । अ꣣रुहन् । प्र꣢ । भूः꣣ । ज꣡यः꣢꣯ । य꣡था꣢꣯ । प꣣था꣢ । उत् । द्याम् । अ꣡ङ्गि꣢꣯रसः । य꣣युः ॥९२॥

Mantra without Swara
इत एत उदारुहन्दिवः पृष्ठान्या रुहन् । प्र भूर्जयो यथा पथोद्यामङ्गिरसो ययुः ॥९२

इतः । एते । उदारुहन् । उत् । आरुहन् । दिवः । पृष्ठानि । आ । अरुहन् । प्र । भूः । जयः । यथा । पथा । उत् । द्याम् । अङ्गिरसः । ययुः ॥९२॥

Samveda - Mantra Number : 92
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 10;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
पूर्व मन्त्र में जो होम से समस्त देवों की अनुकूलता कही है उस की रीति इस मन्त्र में वर्णित की गई है कि — (यथा) जिस प्रकार (भूः) पृथिवी के (जयः) जीतने वाले (पथः) मार्गों को (उदारुहन्) उभर कर चलते हैं, तद्वत् (एते) ये (अंगिरसः) अग्निकुण्ड से उठे अङ्गारे वा लपटें (इतः) इस पृथिवी लोक से (दिवः) आकाश के (पृष्ठानि) पीठों को (आरुहन्) चढ़ने और (द्याम्) द्युलोक को (प्र, ययुः) जाते हैं।
अर्थात् जिस प्रकार भूमण्डल के विजयी लोग उन्नत होकर चलते हैं, इसी प्रकार अग्नि में होम किये हुए उत्तम सुगन्ध मिष्ट पुष्ट रोगनाशकादि द्रव्यों सहित अंगारे वा लपटें जब आकाश तल के ऊपर चढ़ते और द्युलोक में पहुंचते हैं तो सूर्य्यादि द्युलोकस्थ देवों की अनुकूलता कराते और उससे परमात्मा की आज्ञा का पालन होता है इससे परमात्मा की सत्कृति भी होती है। जैसा कि पूर्व मन्त्र में कहा था॥
Footnote
पं० ज्वालाप्रसाद भार्गव [आगरा] ने इस मन्त्र के व्याख्यान में इतनी भूल की हैं—१—‘एते’ इस प्रथमान्त पद को पदपाठ के विरुद्ध ‘एत’ ऐसा क्रियापाद लिखा॥ २—‘भू, जयः’ इन दो पदों को भी पदपाठ के विरुद्ध ‘भूर्जपा, उ’ इस प्रकार विश्लिष्ट करके ‘उ’ का अर्थ ‘समष्टिमूर्ति की पूजा प्रतिष्ठारूप मार्ग’ से किया है। जो प्रमाणरहित और निर्मूल है। तथा (द्याम्) का अर्थ ‘महानारायणलोकम्’ किया है। यह इनका महानारायण शब्द निज का है जो किसी अन्य संस्कृतसाहित्यकारादि ने प्रयुक्त नहीं किया॥।
सायणाचार्य ने भी इसमें कई भूलें की हैं। ‘भूः, जयः’ इन दो पदों को ‘भृर्जयः’ ऐसा भृज्जति धातु का एक प्रयोग माना है। जो पदपाठ के विरुद्ध है। इसकी विरुद्धता को श्री सत्यव्रतसामश्रमी जी ने भी अपनी टिप्पणी में लिखा है कि “यह व्याख्यान ठीक नहीं क्योंकि पदकार ने भूः, जयः ऐसा दो पदों का विश्लेष किया है। जो कि भृज्जति धातु से भूर्जयः बनाने पर सम्भव नहीं और न फिर दो पदों के अधीन स्वर ही सम्भव है। विवरणकार तो—भू पृथिवी को जो महावीरानुष्ठान से जीतते हैं, वे ऐसा कहते हैं” सामश्रमी जी ने भी विवरणकार और सायण के दोष बताकर निर्दोष क्या अर्थ है, यह नहीं लिखा। अस्तु यहाँ भूः यह षष्ठयर्थ में प्रथमा तथा जि धातु को छान्दस तुक् आगम के अभाव से जयः यह प्रथमा का बहुवचन समझना चाहिए। ‘पथो’ में सायणाचार्य और ज्वालाप्रसाद जी ने ‘पथा, उ’ ऐसा विश्लेष भी पदपाठ के विरुद्ध ही किया हैं॥