Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 916

1875 Mantra
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ꣣यं꣡ वा꣢म꣣स्य꣡ मन्म꣢꣯न꣣ इ꣡न्द्रा꣢ग्नी पू꣣र्व्य꣡स्तु꣢तिः । अ꣣भ्रा꣢द्वृ꣣ष्टि꣡रि꣢वाजनि ॥९१६॥

इ꣣य꣢म् । वा꣣म् । अ꣢स्य । म꣡न्म꣢꣯नः । इ꣡न्द्रा꣢꣯ग्नी । इ꣡न्द्र꣢꣯ । अ꣣ग्नीइ꣡ति꣢ । पू꣣र्व्य꣡स्तु꣢तिः । पू꣣र्व्य꣢ । स्तु꣣तिः । अभ्रा꣢त् । वृ꣣ष्टिः꣢ । इ꣣व । अजनि ॥९१६॥

Mantra without Swara
इयं वामस्य मन्मन इन्द्राग्नी पूर्व्यस्तुतिः । अभ्राद्वृष्टिरिवाजनि ॥

इयम् । वाम् । अस्य । मन्मनः । इन्द्राग्नी । इन्द्र । अग्नीइति । पूर्व्यस्तुतिः । पूर्व्य । स्तुतिः । अभ्रात् । वृष्टिः । इव । अजनि ॥९१६॥

Samveda - Mantra Number : 916
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्राग्नी) हे अध्यापक और अध्येताओ ! (अस्य) इस (मन्मनः) मन्त्र से (इयम्) यह (युवयोः) तुम्हारी (पूर्व्यस्तुतिः) सनातनी प्रशंसा (अजनि) प्रकट होती है। (इव) जैसे (अभ्रात्) बादल से (वृष्टि) वर्षा प्रकट होती है, तद्वत्॥
इन्द्र शब्द से सूर्य और अग्नि शब्द से प्रसिद्ध भाग का ग्रहण तो स्पष्ट ही है, परन्तु हमने यहाँ इन्द्र शब्द से अध्यापक और अग्नि शब्द से अध्येता ग्रहण किया है। क्योंकि जैसे सूर्य के प्रकाश से अग्नि प्रकाशित होता है वैसे ही अध्यापक के अध्यापन से अध्येता ज्ञान द्वारा प्रकाशित होता है। उन दोनों की प्रशंसा इस मन्त्र से की गई है॥
Footnote
ऋ० ७। ९४। १ में भी॥