Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 910

1875 Mantra
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣यं꣡ वां꣢ मित्रावरुणा सु꣣तः꣡ सोम꣢꣯ ऋतावृधा । म꣢꣫मेदि꣣ह꣡ श्रु꣢त꣣ꣳ ह꣡व꣢म् ॥९१०॥

अ꣣य꣢म् । वा꣣म् । मित्रा । मि । त्रा । वरुणा । सुतः꣢ । सो꣡मः꣢꣯ । ऋ꣣तावृधा । ऋत । वृधा । म꣡म꣢꣯ । इत् । इ꣣ह꣢ । श्रु꣣तम् ह꣡व꣢꣯म् ॥९१०॥

Mantra without Swara
अयं वां मित्रावरुणा सुतः सोम ऋतावृधा । ममेदिह श्रुतꣳ हवम् ॥

अयम् । वाम् । मित्रा । मि । त्रा । वरुणा । सुतः । सोमः । ऋतावृधा । ऋत । वृधा । मम । इत् । इह । श्रुतम् हवम् ॥९१०॥

Samveda - Mantra Number : 910
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(ऋतावृधा) यज्ञ से बढ़ने वाले (मित्रावरुणा) प्राण और अपान ! (वाम्) तुम दोनों के लिये (अयम्) यह सोम (सुतः) अभिषुत किया है (इत्) अतएव (इह) इस लोक में (मम) मेरे (हवम्) बुलावे को (श्रुतम्) सुनो॥
Footnote
ऋ० २। ४१। ४ में भी॥
मित्र और वरुण का व्याख्यान ७९३ मन्त्र पर कर आये हैं। वहीं प्राण अपान के जड़ होने पर भी पुकार सुनने आदि का समाधान है॥