Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 904

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- भृगुर्वारुणिर्जमदग्निर्भार्गवो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
हि꣣न्व꣢न्ति꣣ सू꣢र꣣मु꣡स्र꣢यः꣣ स्व꣡सारो जा꣣म꣢य꣣स्प꣡ति꣢म् । म꣣हा꣡मिन्दुं꣢꣯ मही꣣यु꣡वः꣢ ॥९०४॥

हि꣣न्व꣡न्ति꣢ । सू꣡र꣢꣯म् । उ꣡स्र꣢꣯यः । स्व꣡सा꣢꣯रः । जा꣣म꣡यः꣢ । प꣡ति꣢꣯म् । म꣣हा꣢म् । इ꣡न्दु꣢꣯म् । म꣣हीयु꣡वः꣢ ॥९०४॥

Mantra without Swara
हिन्वन्ति सूरमुस्रयः स्वसारो जामयस्पतिम् । महामिन्दुं महीयुवः ॥

हिन्वन्ति । सूरम् । उस्रयः । स्वसारः । जामयः । पतिम् । महाम् । इन्दुम् । महीयुवः ॥९०४॥

Samveda - Mantra Number : 904
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(उत्रयः) सूर्य किरणें (स्वसारः) आपस में भगिनिये (जामयः) स्त्रीरुपिणियें (पतिम्) पालक (सूरम्) सूर्य को (हिन्वन्ति) मानो प्रीति से सेवन करती हैं वैसे ही (महीयुवः) पृथिवी से छटी हुई सोमकिरणें (महाम्) प्रशंसनीय (इन्दुम्) सोम का सेवन करती हैं।
यद्वा — (जामयः) स्त्रीरूपिणी (स्वसारः) एक हाथ से उत्पन्न होने से परस्पर भगिनी अंगुलियें (उस्रयः) कर्म के लिये रहने वाली (महीयुवः) सोमके अभिषव करने को चाहती हुई (सूपम्) सुन्दर वीर्यं वाले। क्योंकि सोमपान से वीर्य बढ़ता है। (पतिम्) पतिरूप पालक (महाम्) प्रशंसनीय (इन्दुम्) ग्रह नामक सोम के घटों में टपकते सोम को (हिन्वन्ति) प्रेरित करती हैं।
Footnote
निघण्टु २। ५ इत्यादि प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥
ऋ० ९। ६५। १ में भी॥