Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 90

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवः कश्यपो वा मारीचो मनुर्वा वैवस्वत अभौ वा Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
जा꣣तः꣡ परे꣢꣯ण꣣ ध꣡र्म꣢णा꣣ य꣢त्स꣣वृ꣡द्भिः꣢ स꣣हा꣡भु꣢वः । पि꣣ता꣢꣫ यत्क꣣श्य꣡प꣢स्या꣣ग्निः꣢ श्र꣣द्धा꣢ मा꣣ता꣡ मनुः꣢꣯ क꣣विः꣢ ॥९०

जा꣣तः꣢ । प꣡रे꣢꣯ण । ध꣡र्म꣢꣯णा । यत् । स꣣वृ꣡द्भिः꣢ । स꣣ । वृ꣡द्भिः꣢꣯ । स꣣ह꣢ । अ꣡भु꣢꣯वः । पि꣣ता꣢ । यत् । क꣣श्य꣡प꣢स्य । अ꣣ग्निः꣢ । श्र꣣द्धा꣢ । श्र꣣त् । धा꣢ । मा꣣ता꣢ । म꣡नुः꣢꣯ । क꣣विः꣢ ॥९०॥

Mantra without Swara
जातः परेण धर्मणा यत्सवृद्भिः सहाभुवः । पिता यत्कश्यपस्याग्निः श्रद्धा माता मनुः कविः ॥९०

जातः । परेण । धर्मणा । यत् । सवृद्भिः । स । वृद्भिः । सह । अभुवः । पिता । यत् । कश्यपस्य । अग्निः । श्रद्धा । श्रत् । धा । माता । मनुः । कविः ॥९०॥

Samveda - Mantra Number : 90
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 9;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(यत्) जो (अग्निः) अग्नि (कश्यपस्य) सूर्य का (पिता) कारण वा जनक है वही (यत्) जब [कार्यावस्था में] (सवृद्भिः) सहवर्ति ऋत्विजों के (सह) साथ (परेण) श्रेष्ठ (धर्मणा) धर्मं यज्ञ से (जातः, प्रभुवः) उत्पन्न होता है तब (श्रद्धा) सत्य का धर्त्ता (मनुः) मननशील (कविः) मेधावी पुरुष [उस अग्नि की] (माता) माता के तुल्य जन्मदाता होता है॥
यह एक विचित्र बात है कि जिस कारणरूप अग्नि से महान तेजस्वी सूर्य पुत्र जन्मता है, और जो अग्नि इस कारण सूर्य का पिता कहा जा सकता है वही अग्नि, कार्यरूप में परिणत होने से यज्ञ में ऋत्विजों के साथ होकर उत्पन्न होता है, तब अग्न्याधान करने वाले मेधावी मननशील पुरुष का पुत्र हो जाता है, और वह पुरुष उस अग्नि को जन्म देने वाला होने से माता के तुल्य हो जाता है॥
Footnote
निघं० १। १२॥ ३।१०॥ ३।१५॥ महाभाष्य आ० २॥ उणादि १।१० के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥
पं० ज्वालाप्रसाद भार्गव ने अपने भाष्य में “धर्मशब्द यज्ञनाम है निघं० ३। १७” ऐसा लिखा है। परन्तु निघण्टु के तृतीय पाद सत्रहवें खण्ड में घर्म शब्द है, धर्म नहीं। वास्तव में इन्होंने निघण्टु तो देखा नहीं केवल सत्यव्रत सामश्रमी जी की टिप्पणी में देखकर ज्यों का त्यों उद्धृत कर दिया है। सामश्रमी जी ने लेखभ्रम से घ का ध समझा होगा। भला इस प्रकार के पुरुष भाष्यकार बनें तब देश वा धर्म रसातल को न पहुँचे तो क्या हो॥