Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 9

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
त्वा꣡म꣢ग्ने꣣ पु꣡ष्क꣢रा꣣द꣡ध्यथ꣢꣯र्वा꣣ नि꣡र꣢मन्थत । मू꣣र्ध्नो꣡ विश्व꣢꣯स्य वा꣣घ꣡तः꣢ ॥९॥

त्वा꣢म् । अ꣣ग्ने । पु꣡ष्क꣢꣯रात् । अ꣡धि꣢꣯ । अ꣡थ꣢꣯र्वा । निः । अ꣣मन्थत । मूर्ध्नः꣢ । वि꣡श्व꣢꣯स्य । वा꣣घ꣡तः꣢ ॥९॥

Mantra without Swara
त्वामग्ने पुष्करादध्यथर्वा निरमन्थत । मूर्ध्नो विश्वस्य वाघतः ॥

त्वाम् । अग्ने । पुष्करात् । अधि । अथर्वा । निः । अमन्थत । मूर्ध्नः । विश्वस्य । वाघतः ॥९॥

Samveda - Mantra Number : 9
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अग्ने) हे अग्ने (त्वाम्) तुझ को (अथर्वा) परमात्मा नै ( मूर्ध्नः) शिर के समान धारक और ( विश्वस्य) सबके (वाघतः) अग्निजन्य प्रकाश के ले चलने वाले ( पुष्करात्, अधि) आकाश में (निरमन्यत) उत्पन्न किया है ।
तात्पर्य यह है कि परमात्मा ने अग्नि को प्रकाश में उत्पन्न किया है और इसका प्रयोजन वेदमन्त्र बतलाता है कि वह आकाश सब का धारण करता है और उत्पन्न हुए अग्नि के प्रकाश का वही वाहन है अर्थात् आकाश ही प्रकाश को एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँचाता है [ सूर्यादि का प्रकाश आकाश द्वारा ही हम तक आता हैं ] ॥
ईश्वर पक्ष में: — (अग्ने) हे ज्ञानप्रद ! परमात्मन् ! (त्वाम्) तुझको ( अथर्वा ) ज्ञानी पुरुष ( मूर्ध्नः ) मस्तिष्क [दिमाग ] से और ( विश्वस्य ) सबके ( वाघतः ) वाहक ( पुष्करात्) हृदयकमल (ऋषि) में ( निरमन्थत ) आविर्भूत = प्रत्यक्ष करता है ।
अर्थात् परमात्मा ज्ञानियों के हृदय में प्रत्यक्ष होता है । परन्तु सामान्यतया नहीं किन्तु मस्तिष्क से अर्थात् विचार के बल से । इस मन्त्र में हृदय को सबका वाहन बताया गया है । यथार्थ में हृदय के ज्ञान बिना प्राणिमात्र जड़ है और हिल-चल सकने को असमर्थ है इसलिये हृदय ही सबका वाहन है ।
Footnote
निघं० १। ३ ऋ० १ । १६४ । २० के प्रमाण संस्कृतभाष्य पृष्ठ ३० में देखिये । ऋग्वेद ६ । १६ । १३ । में भी यही पाठ है ॥