Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 881

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गोषूक्त्यश्वसूक्तिनौ काण्वायनौ Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
ये꣢न꣣ ज्यो꣡ती꣢ꣳष्या꣣य꣢वे꣣ म꣡न꣢वे च वि꣣वे꣡दि꣢थ । म꣣न्दानो꣢ अ꣣स्य꣢ ब꣣र्हि꣢षो꣣ वि꣡ रा꣢जसि ॥८८१॥

ये꣡न꣢꣯ । ज्यो꣡ती꣢꣯ꣳषि । आ꣡व꣡ये꣢ । म꣡न꣢꣯वे । च꣣ । विवे꣡दि꣢थ । म꣣न्दानः꣢ । अ꣣स्य꣢ । ब꣡र्हि꣢षः꣢ । वि । रा꣡जसि ॥८८१॥

Mantra without Swara
येन ज्योतीꣳष्यायवे मनवे च विवेदिथ । मन्दानो अस्य बर्हिषो वि राजसि ॥

येन । ज्योतीꣳषि । आवये । मनवे । च । विवेदिथ । मन्दानः । अस्य । बर्हिषः । वि । राजसि ॥८८१॥

Samveda - Mantra Number : 881
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
हे परमेश्वर ! इन्द्र ! (येन) जिस कारण (अस्य) इस उपासक के (बर्हिषः) योगयज्ञ के मध्य में (विराजसि) आप विराजते हैं इस कारण (मन्दानः) आनन्दस्वरूप आप (मनवे) मन = अन्तःकरण (च) और (आयवे) प्राण [शतपथ ४। २। ३। १] के लिये (ज्योतींषि) ज्योतिषियों को (विवेदिथ) प्राप्त कराते हैं।
Footnote
ऋ० ८।१५।५ में भी ऐसा ही पाठ है। परन्तु आश्चर्य है कि विलायती जर्मन के छपे पुस्तक की नकल से वा अन्य किसी कारण से ऐसियाटिक सुसाइटी के सायणभाष्य और गानयुक्त पुस्तक में “मनत्रे मनवे” ऐसा दो बार पाठ भ्रान्ति से छप गया। उसी की देखादेखी अजमेर के वैदिक यन्त्रालय के मूल पुस्तक में भी वैसा ही छप गया और आगरे के भार्गव जी ने तो दूसरे “मनवे” पद का अर्थ भी करडाला ! यह विचार नहीं किया कि न तो उष्णिक् छन्द में ये ३ अक्षर बढ़ सकते हैं, न सायणभाष्य में द्विरुक्त की व्याख्या है, न पदपाठ पुस्तक में, न ऋग्वेद ८।१५।५ में, न गानग्रन्थों में इसका पुनर्गान है, जीवानन्द के छपाये पुस्तक में भी इस का दो बार पाठ नहीं है॥