Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 877

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- पवित्र आङ्गिरसः Chhand- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
अ꣡रू꣢रुचदु꣣ष꣢सः꣣ पृ꣡श्नि꣢र꣣ग्रि꣢य उ꣣क्षा꣡ मि꣢मेति꣣ भु꣡व꣢नेषु वाज꣣युः꣢ । मा꣣यावि꣡नो꣢ ममिरे अस्य मा꣣य꣡या꣢ नृ꣣च꣡क्ष꣢सः पि꣣त꣢रो꣣ ग꣢र्भ꣣मा꣡ द꣢धुः ॥८७७॥

अ꣡रु꣢꣯रुचत् । उ꣣ष꣡सः꣢ । पृ꣡श्निः꣢꣯ । अ꣣ग्रियः꣢ । उ꣣क्षा꣢ । मि꣣मेति । भु꣡व꣢꣯नेषु । वा꣣ज꣢युः । मा꣣यावि꣡नः꣢ । म꣣मिरे । अस्य । माय꣡या꣢ । नृ꣣च꣡क्ष꣢सः । नृ꣣ । च꣡क्ष꣢꣯सः । पि꣣त꣡रः꣢ । ग꣡र्भ꣢꣯म् । आ । द꣣धुः ॥८७७॥

Mantra without Swara
अरूरुचदुषसः पृश्निरग्रिय उक्षा मिमेति भुवनेषु वाजयुः । मायाविनो ममिरे अस्य मायया नृचक्षसः पितरो गर्भमा दधुः ॥

अरुरुचत् । उषसः । पृश्निः । अग्रियः । उक्षा । मिमेति । भुवनेषु । वाजयुः । मायाविनः । ममिरे । अस्य । मायया । नृचक्षसः । नृ । चक्षसः । पितरः । गर्भम् । आ । दधुः ॥८७७॥

Samveda - Mantra Number : 877
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अस्य) इस सोम के (मायया) बुद्धि तत्त्व से (मायाविनः) बुद्धिमान् लोग वा बुद्धितत्त्वयुक्त पदार्थ (ममिरे) बने हैं, तथा (अग्रियः) मुख्य आदित्य सूर्य (उक्षाः) वृष्टि करने में समर्थ (भुवनेषु) लोकों में (वाजयुः) अन्नोत्पत्ति के लिये (मिमेति) जल वर्षाता है तथा (उषसः) प्रभातों को (अरूरुचत्) प्रकाशित करता है। (नृचक्षसः) मनुष्यों को दिखाने वाली (पितरः) चन्द्रकिरणें जो कि पालन करती हैं (गर्भम्) सोमगर्भ का (आदधुः) आधान करती हैं।
Footnote
निरुक्त २। १४ का प्रमाण, जिसका अर्थ यह है कि—“सूर्य पृश्नि है क्योंकि इसमें रंगतें व्याप रही हैं” तथा निघण्टु ३। ९ का प्रमाण, जिसका अर्थ यह है कि “माया बुद्धितत्त्व का नाम है” और सायणाचार्य का प्रमाण जिसका यह तात्पर्य है कि “इस ऋचा में सूर्य किरणगत सोम का वर्णन है, क्योंकि सूर्य की किरणों से चन्द्रमा की किरण बढ़ती हैं और चन्द्रमा की किरणें जगत् का पालन करने से पितर कहाती हैं और सोमलता का गर्भाधान करती हैं अर्थात् वैद्यकशास्त्रानुसार चन्द्रकिरणों से सोमलता की उत्पत्ति होती है” और ऋ० ९। ८३। ३ का पाठान्तर संस्कृतभाष्य में देखिये॥