Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 855

1875 Mantra
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ह꣣थो꣢ वृ꣣त्रा꣡ण्यार्या꣢꣯ ह꣣थो꣡ दासा꣢꣯नि सत्पती । ह꣣थो꣢꣫ विश्वा꣣ अ꣢प꣣ द्वि꣡षः꣢ ॥८५५॥

ह꣣थः꣢ । वृ꣣त्रा꣡णि꣢ । आ꣡र्या꣢꣯ । ह꣣थः꣢ । दा꣡सा꣢꣯नि । स꣣त्पती । सत् । पतीइ꣡ति꣢ । ह꣡थः꣢ । वि꣡श्वा꣢꣯ । अ꣡प꣢꣯ । द्वि꣡षः꣢꣯ ॥८५५॥

Mantra without Swara
हथो वृत्राण्यार्या हथो दासानि सत्पती । हथो विश्वा अप द्विषः ॥

हथः । वृत्राणि । आर्या । हथः । दासानि । सत्पती । सत् । पतीइति । हथः । विश्वा । अप । द्विषः ॥८५५॥

Samveda - Mantra Number : 855
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(सत्पती) यज्ञानुष्ठानी सत्पुरुषों के रक्षक सूर्य और अग्नि (आर्या) आर्यों के (वृत्राणि) रोकने वाले द्रव्यों का (हथः) नाश करें। (दासानि) उनके उपलक्षयकारक पदार्थों का (हथः) निबारण करें और उनकी (विश्वाः द्विषः) सब हानिकारिणी प्रजाओं को (अप हथः) दूर करें।
अन्नादि दिव्य पदार्थों की अनुकूलता से रोगादि की निवृत्ति द्वारा हमको सुख हो, यह भाव है॥
Footnote
ऋ० ६। ६०। ६ का पाठान्तर संस्कृतभाष्य में देखिये॥