Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 853

1875 Mantra
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ता꣡ हु꣢वे꣣ य꣡यो꣢रि꣣दं꣢ प꣣प्ने꣡ विश्वं꣢꣯ पु꣣रा꣢ कृ꣣त꣢म् । इ꣣न्द्राग्नी꣡ न म꣢꣯र्धतः ॥८५३॥

ता꣢ । हु꣣वे । य꣡योः꣢꣯ । इ꣡द꣢म् । प꣣प्ने꣢ । वि꣡श्व꣢꣯म् । पु꣣रा꣢ । कृ꣣त꣢म् । इ꣣न्द्रा꣢ग्नी । इ꣣न्द्र । अग्नी꣡इति꣢ । न । म꣣र्धतः ॥८५३॥

Mantra without Swara
ता हुवे ययोरिदं पप्ने विश्वं पुरा कृतम् । इन्द्राग्नी न मर्धतः ॥

ता । हुवे । ययोः । इदम् । पप्ने । विश्वम् । पुरा । कृतम् । इन्द्राग्नी । इन्द्र । अग्नीइति । न । मर्धतः ॥८५३॥

Samveda - Mantra Number : 853
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
अब इन्द्राग्नि के उद्देश का आज्य कहते हैं — (ययोः) जिन दोनों की (पुरा) सृष्टि के आरम्भकाल में (कृतम्) सहायता से बना (इदं विश्वम्) यह चराऽचर जगत् (पप्ने) प्रशंसित किया जाता है (ता) उन इन्द्र और अग्नि को (हुवे) उद्देश करके होम करता हूँ, जिससे (इन्द्राग्नी) वे सूर्य और अग्नि (न मर्धतः) दुःखदायक न हों।
Footnote
ऋ० ६। ६०। ४ में भी॥