Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 852

1875 Mantra
Devata- मरुत इन्द्रश्च Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
वी꣣डु꣡ चि꣢दारुज꣣त्नुभि꣣र्गु꣡हा꣢ चिदिन्द्र꣣ व꣡ह्नि꣢भिः । अ꣡वि꣢न्द उ꣣स्रि꣢या꣣ अ꣡नु꣢ ॥८५२॥

वी꣣डु꣢ । चि꣣त् । आरुजत्नु꣡भिः꣢ । आ꣣ । रुजत्नु꣡भिः꣢ । गु꣡हा꣢꣯ । चि꣡त् । इन्द्र । व꣡ह्नि꣢꣯भिः । अ꣡वि꣢꣯न्दः । उ꣣स्रि꣡याः꣢ । उ꣣ । स्रि꣡याः꣢꣯ । अ꣡नु꣢꣯ ॥८५२॥

Mantra without Swara
वीडु चिदारुजत्नुभिर्गुहा चिदिन्द्र वह्निभिः । अविन्द उस्रिया अनु ॥

वीडु । चित् । आरुजत्नुभिः । आ । रुजत्नुभिः । गुहा । चित् । इन्द्र । वह्निभिः । अविन्दः । उस्रियाः । उ । स्रियाः । अनु ॥८५२॥

Samveda - Mantra Number : 852
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्र) इन्द्रियों के प्रवर्त्तक जीवात्मन् ! इस [पूर्वमन्त्रोक्त] रीति से जन्म ग्रहण करता हुआ तू (गुहा) छिपी जगह में (चित्) भी और (वीळु) दृढ़ को (चित्) भी (आरुजत्नुभिः) भेदन करने वाले (वह्निभिः) मार्गदर्शक ज्ञानाग्नियों से (उस्त्रियाः) पञ्चज्ञानेन्द्रियों के (अनु) अनुसार होकर (अविन्दः) प्रान्तव्य विषय को प्राप्त होता है।
भौतिक पक्ष में— (इन्द्र) बिजुली वा सूर्य (गुहाचित्) गह्वरस्थानों में भी (वीळु चित्) दृढ़ महल आदि को भी (आरुजत्नुभिः) भंग कर डालने वाले (वह्निभिः) अग्नियों वा किरणों से (उस्त्रिया) पृथिव्यादि लोकों को (अनु अविन्दः) प्राप्त होता है॥
Footnote
निघण्टु २। ९। २। ११। १। १ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥
ऋ० १। ६। ५ में भी॥