Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 850

1875 Mantra
Devata- मरुत इन्द्रश्च Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ꣡न्द्रे꣢ण꣣ स꣡ꣳ हि दृक्ष꣢꣯से संजग्मा꣣नो꣡ अबि꣢꣯भ्युषा । म꣣न्दू꣡ स꣢मा꣣न꣡व꣢र्च्चसा ॥८५०॥

इ꣡न्द्रे꣢꣯ण । सम् । हि । दृ꣡क्ष꣢꣯से । सं꣣जग्मानः꣢ । स꣣म् । जग्मानः꣢ । अ꣡बि꣢꣯भ्युषा । अ । बि꣣भ्युषा । मन्दू꣡ इति꣢ । स꣣मान꣡व꣢र्चसा । स꣣मान꣢ । व꣣र्चसा ॥८५०॥

Mantra without Swara
इन्द्रेण सꣳ हि दृक्षसे संजग्मानो अबिभ्युषा । मन्दू समानवर्च्चसा ॥

इन्द्रेण । सम् । हि । दृक्षसे । संजग्मानः । सम् । जग्मानः । अबिभ्युषा । अ । बिभ्युषा । मन्दू इति । समानवर्चसा । समान । वर्चसा ॥८५०॥

Samveda - Mantra Number : 850
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
हे जीवात्मन् ! तू (अबिभ्युषा) भयरहित निर्भय (इन्द्रेण) परमात्मा से (हि) ही (संजग्मानः) मिला हुआ [मुक्त हुआ] (संदृक्षसे) जब जाना जाता है तब (मन्दू) तुम परमात्मा और जीवात्मा दोनों आनन्दयुक्त (समानवर्चसा) समान तेज वाले होते हो। वह समानता चेतनत्वधर्म को लेकर कही गई है, सर्वांश में नहीं॥
भौतिक पक्ष में:—मरुद्गण (हि) निश्चय करो कि (अबिभ्युषा) अधृष्य (इन्द्रेण) बिजुली से (संजग्मानः) संगत हुआ जब (संदृक्षसे) चमकता है तब (मन्दू) मरुद्गण और बिजुली दोनों खिले हुए (समानवर्चसा) समतेज जान पड़ते हैं।
इससे यह उपदेश किया गया है कि यह जो आकाश में बिजुली (मेघों में) चमकती है सो वायुओं (मरुतों) की रगड़ से चमकती है। यह ऋचा ऋ० १। ६। ७ में भी आई है सो निरुक्त ४। १२ में यास्कमुनि से इस प्रकार व्याख्यात है कि “अधृष्य गण बिजुली से मिलता हुआ दीखता (चमकता) है, दोनों प्रकाशमान होते हैं वा ‘समानवर्चसा’ को तृतीया का १ वचन मानकर यह व्याख्या समझो कि सम तेज वाले, (मन्दू = मन्दुना) प्रकाशयुक्त विद्युत्तत्त्व से मरुद्गण प्रकाशित होता है”॥१॥
Footnote
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