Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 847

1875 Mantra
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
मि꣣त्र꣡ꣳ हु꣢वे पू꣣त꣡द꣢क्षं꣣ व꣡रु꣢णं च रि꣣शा꣡द꣢सम् । धि꣡यं꣢ घृ꣣ता꣢ची꣣ꣳ सा꣡ध꣢न्ता ॥८४७॥

मि꣣त्र꣢म् । मि꣣ । त्र꣢म् । हु꣣वे । पूत꣡द꣢क्षम् । पू꣣त꣢ । द꣣क्षम् । व꣡रु꣢꣯णम् । च꣣ । रिशा꣡द꣢सम् । धि꣡य꣢꣯म् । घृ꣣ता꣡ची꣢म् । सा꣡ध꣢꣯न्ता ॥८४७॥

Mantra without Swara
मित्रꣳ हुवे पूतदक्षं वरुणं च रिशादसम् । धियं घृताचीꣳ साधन्ता ॥

मित्रम् । मि । त्रम् । हुवे । पूतदक्षम् । पूत । दक्षम् । वरुणम् । च । रिशादसम् । धियम् । घृताचीम् । साधन्ता ॥८४७॥

Samveda - Mantra Number : 847
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
मैं यज्ञकर्त्ता यजमान (पूतदक्षम्) पबित्र बल वाले (मित्रम्) अणुओं के प्राणवायु (च) और (रिशादसम्) हिंसक दुःखदायक वायु आदि के अणुओं के नाश करने वाले (वरुणम्) अपानवायु को (हुवे) उद्देश्य करके होम करता हूँ। जो कि प्राण और अपान (घृताचीं, धियम्) जल वर्षाने वाले कर्म को (साधन्ता) साधने वाले हैं।
जिस प्रकार मनुष्यादि प्राणियों के शरीर में प्राण अपान वायु हैं इसी प्रकार अन्तरिक्ष में भी प्राण और अपान व्याप्त हैं, जो कि निरुक्त के अनुसार अन्तरिक्ष स्थान देवतों में गिने गये हैं। उनका दूसरा नाम यहां मित्र और वरुण है। वे ही अन्तरिक्ष में फैले हुए मित्रावरुण = प्राणाऽपान मनुष्यादिदेहस्थ प्राणापान का आप्यायन करते हैं, उनके उत्तम शुद्ध तृप्त बनाने के लिये इस मन्त्र में होम करने का विधान सिद्धानुवाद से वर्णित है। शतपथ ६।३।६।५ में मित्र = प्राण और श० १२। ४। ४। १२ में वरुण = अपान का नाम है। निरुक्त अ० १० खण्ड १ और ३ में मध्यस्थान देवतों के शीर्षक (हैडिङ्ग) में वरुण का व्याख्यान है और ऋ० ५। ८५। ३ का प्रमाण देकर निरुक्तकार ने वरुण = अपान वायु के काम बताये हैं कि वह मेघ को वर्षाता है, नीचा करता है, वह द्युलोक, पृथ्वीलोक और अन्तरिक्ष लोक को तर करता है, इससे वह सब भुवनों का राजा कहाता है, वह जैसे वृष्टि खेती को तर करती है, वैसे पृथ्वी को गीला और तर करता है। फिर उसी अ० १० खण्ड २१। २२ में मित्र = प्राण वायु का व्याख्यान करते हुए ऋ० ३। ५९। १ का प्रमाण देकर मित्र = प्राण के काम बताये हैं कि वह शब्द करता है, प्राणियों को जीवित रखता — मृत्यु से बचाता है, इसलिये प्राण पृथ्वी और द्युलोक के प्राणिवर्ग का धारक है, प्राण प्रतिक्षण मनुष्यादि प्राणियों पर अपना प्रभाव रखता है, जिससे मनुष्यादि कर्म करने में समर्थ होते हैं। उस प्राण के लिये घृत मिले चरु से होम करो इत्यादि।
Footnote
अष्टाध्यायी ३। १। ८५॥ ३। १। ४॥ ६। १। १६२॥ ७। १। ३९ इत्यादि के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥
ऋ० १। २। ७ और यजुः ३३। ५७ में भी॥