Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 844

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣ग्नि꣢ना꣣ग्निः꣡ समि꣢꣯ध्यते क꣣वि꣢र्गृ꣣ह꣡प꣢ति꣣र्यु꣡वा꣢ । ह꣣व्यवा꣢ड्जु꣣꣬ह्वा꣢꣯स्यः ॥८४४॥

अ꣣ग्नि꣡ना꣢ । अ꣣ग्निः꣢ । सम् । इ꣣ध्यते । कविः꣢ । गृ꣣ह꣢प꣢तिः । गृ꣣ह꣢ । प꣣तिः । यु꣡वा꣢꣯ । ह꣣व्य꣢वाट् । ह꣣व्य । वा꣢ट् । जु꣣ह्वा꣢स्यः । जु꣣हू꣢ । आ꣣स्यः ॥८४४॥

Mantra without Swara
अग्निनाग्निः समिध्यते कविर्गृहपतिर्युवा । हव्यवाड्जुह्वास्यः ॥

अग्निना । अग्निः । सम् । इध्यते । कविः । गृहपतिः । गृह । पतिः । युवा । हव्यवाट् । हव्य । वाट् । जुह्वास्यः । जुहू । आस्यः ॥८४४॥

Samveda - Mantra Number : 844
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
विवरणकार कहते हैं कि — बहिष्पवमान कहा गया, अब सप्तदश स्तोम के भेद कहते हैं कि यहाँ से आज्यों का वर्णन है, जिसमें यह आग्नेय आज्य का आरम्भ है॥ (कविः) मेघातत्त्वोद्बोधक (गृहपतिः) यज्ञानुष्ठान सम्पन्न घर का रक्षक (युवा) कभी वृद्ध न होने वाला (हव्यवाट्) हव्य पहुँचाने वाला (जुह्वास्यः) यज्ञपात्र जुहू जिसका का मुख है (अग्निः) वह आहवनीय अग्नि (अग्निना) अरणिमन्थन से उत्पन्न हुए अग्नि द्वारा (समिध्यते) भले प्रकार सुलगाया जाता है
अध्यात्मपक्ष में— (कविः) ज्ञानी (गृहपतिः) गृहरूप देह का स्वामी (युवा) वास्तविक स्वरूप से अजर अमर (हव्यवाट्) कर्म फल का भोक्ता (जुह्वास्यः) वाणीरूप मुख वाला (अग्निः) चेतन जीवात्मा (अग्निना) अनन्त ज्ञान वाले परमात्मा से (समिध्यते) भले प्रकार तेज प्राप्त करता है।
Footnote
शतपथ ११। ५। ६। ३ अष्टाध्यायी ३। २। ६४॥ ७। २। ११५॥ ३। २। ६६॥ ६। २। १३९॥ ३। २। १७८॥ ६। १। १०॥ ७। ४। ६२॥ ८। ४। ५४॥ ६। २। १॥ ८। २। १॥६। १। ६७॥ ८। २। ४ उणादि २। ६१ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋ० १। १२। ६ में भी॥