Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 843

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कश्यपो मारीचः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
पु꣣नानो꣢ दे꣣व꣡वी꣢तय꣣ इ꣡न्द्र꣢स्य याहि निष्कृ꣣त꣢म् । द्यु꣣तानो꣢ वा꣣जि꣡भि꣢र्हि꣣तः꣢ ॥८४३॥

पु꣣ना꣢नः । दे꣣व꣢वी꣢तये । दे꣣व꣢ । वी꣣तये । इ꣡न्द्र꣢꣯स्य । या꣣हि । निष्कृत꣢म् । निः꣣ । कृत꣢म् । द्यु꣣ता꣢नः । वा꣣जि꣡भिः꣢ । हि꣣तः꣢ ॥८४३॥

Mantra without Swara
पुनानो देववीतय इन्द्रस्य याहि निष्कृतम् । द्युतानो वाजिभिर्हितः ॥

पुनानः । देववीतये । देव । वीतये । इन्द्रस्य । याहि । निष्कृतम् । निः । कृतम् । द्युतानः । वाजिभिः । हितः ॥८४३॥

Samveda - Mantra Number : 843
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
हे सोम ! शान्तस्वरूप ! निरुपद्रव ! परमात्मन् ! (पुनानः) अपवित्रों को पवित्र करने वाले, (द्युतानः) अन्धियारे को उजियाला करने वाले, (वाजिभिः) प्राणायामों के साथ (हितः) ध्यान = धारण किये हुए आप (देववीतये) विद्वान् भक्त जनों को प्राप्त होने के लिए (इन्द्रस्य) इन्द्रियों के अधिष्ठाता जीव के (निष्कृतम्) शुद्ध किये हुए अन्तःकरण स्थान में (याहि) सर्वग होने से वर्त्तमान भी साक्षात् अनुभूत हूजिये॥
ओषधि के पक्ष में सोम ! (पुनानः) पवित्रता और (द्युतानः) प्रकाश करता हुआ (वाजिभिः) हविष् वाले होता आदि से (हितः) धारण किया हुआ (देववीतये) वायु आदि देवों को प्राप्त होने के लिये (इन्द्रस्य) बिजुली के (निष्कृतम्) स्थान अन्तरिक्ष को (याहि) प्राप्त हो [होमद्वारा]॥
Footnote
शतपथ ५। २। ४। ९ का प्रमाण और ऋ० ९। ६४। १५ संस्कृतभाष्य में देखिये॥