Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 842

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कश्यपो मारीचः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
पु꣣नानो꣡ वरि꣢꣯वस्कृ꣣ध्यू꣢र्जं꣣ ज꣡ना꣢य गिर्वणः । ह꣡रे꣢ सृजा꣣न꣢ आ꣣शि꣡र꣢म् ॥८४२॥

पु꣣नानः꣢ । व꣡रि꣢꣯वः । कृ꣣धि । ऊ꣡र्ज꣢꣯म् । ज꣡ना꣢꣯य । गि꣣र्वणः । गिः । वनः । ह꣡रे꣢꣯ । सृ꣣जा꣢नः । आ꣣शि꣡र꣢म् । आ꣣ । शि꣡र꣢꣯म् ॥८४२॥

Mantra without Swara
पुनानो वरिवस्कृध्यूर्जं जनाय गिर्वणः । हरे सृजान आशिरम् ॥

पुनानः । वरिवः । कृधि । ऊर्जम् । जनाय । गिर्वणः । गिः । वनः । हरे । सृजानः । आशिरम् । आ । शिरम् ॥८४२॥

Samveda - Mantra Number : 842
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(गिर्वणः) वाणियों से प्रशंसनीय ! सोम ! परमात्मन् ! वा ओषधि ! (हरे) जगद्धर्ता ! वा हरित वर्ण हुआ सोम (पुनानः) शुद्धि करता हुआ और (आशिरम्) प्राण को (सृजानः) देता हुआ (जनाय) ध्यानयज्ञ वा देवयज्ञ के यजमान के लिए (वरिवः) धन वा सुख और (ऊर्जम्) बल सम्पादन (कृधि) कीजिये वा करता है॥
ध्यान स्मरण किया परमात्मा वा हवन किया हुआ सोम यजमान के धन धान्य बल पौरुषादि को बढ़ाता है॥
Footnote
शतपथ १२। ३। ५। २० निघण्टु २। १० के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥
ऋ० ९। ६४। १४ में भी॥