Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 84

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
त्व꣡ꣳहि क्षैत꣢꣯व꣣द्य꣡शोऽग्ने꣢꣯ मि꣣त्रो꣡ न पत्य꣢꣯से । त्वं꣡ वि꣢चर्षणे꣣ श्र꣢वो꣣ व꣡सो꣢ पु꣣ष्टिं꣡ न पु꣢꣯ष्यसि ॥८४॥

त्व꣢म् । हि । क्षै꣡त꣢꣯वत् । य꣡शः꣢꣯ । अ꣡ग्ने꣢꣯ । मि꣣त्रः꣢ । मि꣣ । त्रः꣢ । न । प꣡त्य꣢꣯से । त्वम् । वि꣣चर्षणे । वि । चर्षणे । श्र꣡वः꣢꣯ । व꣡सो꣢꣯ । पु꣣ष्टि꣢म् । न । पु꣣ष्यसि ॥८४॥

Mantra without Swara
त्वꣳहि क्षैतवद्यशोऽग्ने मित्रो न पत्यसे । त्वं विचर्षणे श्रवो वसो पुष्टिं न पुष्यसि ॥

त्वम् । हि । क्षैतवत् । यशः । अग्ने । मित्रः । मि । त्रः । न । पत्यसे । त्वम् । विचर्षणे । वि । चर्षणे । श्रवः । वसो । पुष्टिम् । न । पुष्यसि ॥८४॥

Samveda - Mantra Number : 84
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 9;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अग्ने) अग्ने ! (त्वम्) तू (क्षैतवत्, यशः) पृथिवी के हितकारी अणुयुक्त, जल का (पत्यसे) ईशिता वर्षाने वाला हैं। (विचर्षणे, वसो !) दृष्टि के सहायक ! और ८ वसुओं में एक ! (त्वम्) तू (हि) ही (मित्रो, न) मित्र के समान (श्रवः) अन्न [खेती] को (पुष्टिं, न) पुष्टि सी (पुष्यसि) बढ़ाता है।
पूर्व मन्त्र में जो अग्नि के धूम का आकाश में जाकर मेघादि परिणाम कहा था उसी का स्पष्ट इस मन्त्र में किया है कि—अग्नि ही पृथिवी के हितकारी परमाणुयुक्त जल को बरसाकर, मित्र के तुल्य, खेती को पुष्ट करता है।
Footnote
निघण्टु १।१२॥ २।२१॥ ३।११॥ २।७ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋग्वेद (६।२।१) में भी ऐसा ही पाठ है॥