Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 830

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- जमदग्निर्भार्गवः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ए꣣त꣡ अ꣢सृग्र꣣मि꣡न्द꣢वस्ति꣣रः꣢ प꣣वि꣡त्र꣢मा꣣श꣡वः꣢ । वि꣡श्वा꣢न्य꣣भि꣡ सौभ꣢꣯गा ॥८३०॥

ए꣣ते꣢ । अ꣣सृग्रम् । इ꣡न्द꣢꣯वः । ति꣣रः꣢ । प꣣वि꣡त्र꣢म् । आ꣣श꣡वः꣢ । वि꣡श्वा꣢꣯नि । अ꣣भि꣢ । सौ꣡भ꣢꣯गा । सौ । भ꣣गा ॥८३०॥

Mantra without Swara
एत असृग्रमिन्दवस्तिरः पवित्रमाशवः । विश्वान्यभि सौभगा ॥

एते । असृग्रम् । इन्दवः । तिरः । पवित्रम् । आशवः । विश्वानि । अभि । सौभगा । सौ । भगा ॥८३०॥

Samveda - Mantra Number : 830
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(तिरः पवित्रम्) तिरछे दशापवित्र के प्रतिः (आशवः) शीघ्र जाने वाले (एते) ये (इन्दवः) सोम (विश्वा) सर्व (सौभगा) सौभाग्यों को (अभि) लक्ष्य में रख कर (अग्रम) [अग्नि में] छोड़े जाते हैं॥
Footnote
विवरणकार कहते हैं कि “अब तृतीय दिन का आरम्भ किया जाता है।”
ऋ० ९। ६२। १ में भी॥