Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 83

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
त्वे꣣ष꣡स्ते꣢ धू꣣म꣡ ऋ꣢ण्वति दि꣣वि꣢꣫ सं च्छु꣣क्र꣡ आत꣢꣯तः । सू꣢रो꣣ न꣢꣫ हि द्यु꣣ता꣢꣫ त्वं कृ꣣पा꣡ पा꣢वक꣣ रो꣡च꣢से ॥८३॥

त्वे꣣षः꣢ । ते꣣ । धूमः꣢ । ऋ꣣ण्वति । दि꣣वि꣢ । सन् । शु꣣क्रः꣢ । आ꣡त꣢꣯तः । आ । त꣣तः । सू꣡रः꣢꣯ । न । हि । द्यु꣣ता꣢ । त्वम् । कृ꣣पा꣢ । पा꣣वक । रो꣡च꣢꣯से ॥८३॥

Mantra without Swara
त्वेषस्ते धूम ऋण्वति दिवि सं च्छुक्र आततः । सूरो न हि द्युता त्वं कृपा पावक रोचसे ॥

त्वेषः । ते । धूमः । ऋण्वति । दिवि । सन् । शुक्रः । आततः । आ । ततः । सूरः । न । हि । द्युता । त्वम् । कृपा । पावक । रोचसे ॥८३॥

Samveda - Mantra Number : 83
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 9;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(पावक) शोधकाग्ने ! (ते, त्वेषः) तुझ प्रदीप्त हुए का (शुक्रः) शुद्धिकारक (धूमः) धुवां (दिवि, आततः, सन्) आकाश में, फैला हुआ (ॠण्वति) [मेघरूप में] परिणत हो जाता है (हि) निश्चय (त्वम्) तू (सूरो, न) सूर्य, सा (कृपा, द्युता) समर्थ दीप्ति के साथ (रोचसे) प्रकाश करता है।
तात्पर्य यह है कि अग्नि में होम करने से उसका शुद्ध धुआँ आकाश में मेघ बनता है और जगत् को शुद्ध जल वर्षा कर शुद्ध अन्नादि उत्पन्न कर शुद्ध बुद्धयादि द्वारा उपकृत करता है। अग्नि का प्रकाश सामर्थ्ययुक्त है तथा सूर्यवत् चमकने वाला है॥
(ध्यान रहे कि जो बातें कोटिशः वर्षं वेद के प्रकाश को व्यतीत हो जाने से सामान्य प्रतीत होती हैं वे सृष्टि और वेद के आरम्भ समय में बिना वेद के बहुत दुज्ञेय थीं॥)
Footnote
ऐसा ही पाठ ऋग्वेद ६। २। ६ में भी है॥