Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 829

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- जेता माधुच्छन्दसः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
पू꣣र्वी꣡रिन्द्र꣢꣯स्य रा꣣त꣢यो꣣ न꣡ वि द꣢꣯स्यन्त्यू꣣त꣡यः꣢ । य꣣दा꣡ वाज꣢꣯स्य꣣ गो꣡म꣢त स्तो꣣तृ꣢भ्यो꣣ म꣡ꣳह꣢ते म꣣घ꣢म् ॥८२९॥

पू꣣र्वीः꣢ । इ꣡न्द्र꣢꣯स्य । रा꣣त꣡यः꣢ । न । वि । द꣣स्यन्ति । ऊत꣡यः꣢ । य꣣दा꣢ । वा꣡ज꣢꣯स्य । गो꣡म꣢꣯तः । स्तो꣣तृ꣡भ्यः꣢ । म꣡ꣳह꣢꣯ते । म꣣घ꣢म् ॥८२९॥

Mantra without Swara
पूर्वीरिन्द्रस्य रातयो न वि दस्यन्त्यूतयः । यदा वाजस्य गोमत स्तोतृभ्यो मꣳहते मघम् ॥

पूर्वीः । इन्द्रस्य । रातयः । न । वि । दस्यन्ति । ऊतयः । यदा । वाजस्य । गोमतः । स्तोतृभ्यः । मꣳहते । मघम् ॥८२९॥

Samveda - Mantra Number : 829
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(यदा) जब (गोमतः) गौ के सहित (वाजस्य) अन्न का (मघम्) धन (स्तोतृभ्यः) ऋत्विजों को (मंहते) कोई यजमान श्रद्धा से दान करता तब (इन्द्रस्य) परमात्मा की (ऊतयः) रक्षायें और (रातयः) दानक्रियायें जो (पूर्वीः) सनातन हैं (न विदस्यन्ति) उस यजमान पर क्षीण नहीं होतीं॥
अर्थात् श्रद्धा और विधि से यज्ञ करते हुए गौ आदि धन-धान्य की दक्षिणा देने वाले यजमान को परमात्मा कृपया अनेक प्रकार के धनधान्यादि दानसे उपस्कृत करता है और उसकी रक्षा करता है।
Footnote
ऋ० १। ११। ३ का पाठान्तर और निघण्टु २। १०॥ ३। १० अष्टाध्यायी ६। १। १०६ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥