Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 826

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- श्रुतकक्षः सुकक्षो वा आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
मो꣢꣫ षु ब्र꣣ह्मे꣡व꣢ तदिन्द्र꣣यु꣡र्भुवो꣢꣯ वाजानां पते । म꣡त्स्वा꣢ सु꣣त꣢स्य꣣ गो꣡म꣢तः ॥८२६॥

मा । उ꣣ । सु꣢ । ब्र꣣ह्मा꣢ । इ꣣व । तन्द्रयुः꣢ । भु꣡वः꣢꣯ । वा꣣जानाम् । पते । म꣡त्स्व꣢꣯ । सु꣣त꣡स्य꣢ । गो꣡म꣢꣯तः ॥८२६॥

Mantra without Swara
मो षु ब्रह्मेव तदिन्द्रयुर्भुवो वाजानां पते । मत्स्वा सुतस्य गोमतः ॥

मा । उ । सु । ब्रह्मा । इव । तन्द्रयुः । भुवः । वाजानाम् । पते । मत्स्व । सुतस्य । गोमतः ॥८२६॥

Samveda - Mantra Number : 826
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(वाजानां पते) हे सेना वा बलों के रक्षक ! राजन् ! तू (गोमतः) इन्द्रियों की शक्ति के उत्तेजक (सुतस्य) अभिषुत सोम के, पान से (सुमत्स्व) अच्छे प्रकार हृष्ट जो (उ) और (तन्द्रयुः) धनादि सम्पत्ति के प्रमाद से आलस्ययुक्त (मा) मत (भुवः) हो। दृष्टान्त — (ब्रह्मेव) जैसे ब्राह्मण लोग प्रायः धनादि भोगसाधनों में रति न होने से उनका सञ्चय नहीं करते और इसी से प्रमाद नहीं करते, तद्वत्॥
Footnote
ऋ० ८। ९२। ३० में भी॥