Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 825

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- श्रुतकक्षः सुकक्षो वा आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ए꣣वा꣢ रा꣣ति꣡स्तु꣢विमघ꣣ वि꣡श्वे꣢भिर्धायि धा꣣तृ꣡भिः꣢ । अ꣡धा꣢ चिदिन्द्र नः꣣ स꣡चा꣢ ॥८२५॥

ए꣣व꣢ । रा꣣तिः꣢ । तु꣣विमघ । तुवि । मघ । वि꣡श्वे꣢꣯भिः । धा꣣यि । धातृ꣡भिः꣢ । अ꣡ध꣢꣯ । चि꣣त् । इन्द्र । नः । स꣡चा꣢꣯ ॥८२५॥

Mantra without Swara
एवा रातिस्तुविमघ विश्वेभिर्धायि धातृभिः । अधा चिदिन्द्र नः सचा ॥

एव । रातिः । तुविमघ । तुवि । मघ । विश्वेभिः । धायि । धातृभिः । अध । चित् । इन्द्र । नः । सचा ॥८२५॥

Samveda - Mantra Number : 825
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(तुवीमघ) हे बहुत कोष घन वाले ! (इन्द्र) राजन् ! (विश्वेभिः) सब (धातृभिः) कर्मधारक राजपुरुषों से [आप का] (रातिः) [वेतनादि] देना (धायि) धारण किया जाता है (अध) और आप (नः) हम प्रजाजनों के (चित्) भी (सचा) धनादि देने से (एव) ही व्यापार सहायक हूजिये॥
Footnote
ऋ० ८। ९२। २९ में—इन्द्र में सचा—पाठ है॥