Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 80

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- पायुर्भारद्वाजः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
स꣣ना꣡द꣢ग्ने मृणसि यातु꣣धा꣢ना꣣न्न꣢ त्वा꣣ र꣡क्षा꣢ꣳसि꣣ पृ꣡त꣢नासु जिग्युः । अ꣡नु꣢ दह स꣣ह꣡मू꣢रान्क꣣या꣢दो꣣ मा꣡ ते꣢ हे꣣त्या꣡ मु꣢क्षत꣣ दै꣡व्या꣢याः ॥८०॥

स꣣ना꣢त् । अ꣣ग्ने । मृणसि । यातुधा꣡ना꣢न् । या꣣तु । धा꣡ना꣢꣯न् । न । त्वा꣣ । र꣡क्षाँ꣢꣯सि । पृ꣡त꣢꣯नासु । जि꣣ग्युः । अ꣡नु꣢꣯ । द꣣ह । सह꣡मू꣢रान् । स꣣ह꣢ । मू꣣रान् । क꣣या꣡दः꣢ । क꣣य । अ꣡दः꣢꣯ । मा । ते꣣ । हेत्याः꣢ । मु꣣क्षत । दै꣡व्या꣢꣯याः ॥८०॥

Mantra without Swara
सनादग्ने मृणसि यातुधानान्न त्वा रक्षाꣳसि पृतनासु जिग्युः । अनु दह सहमूरान्कयादो मा ते हेत्या मुक्षत दैव्यायाः ॥

सनात् । अग्ने । मृणसि । यातुधानान् । यातु । धानान् । न । त्वा । रक्षाँसि । पृतनासु । जिग्युः । अनु । दह । सहमूरान् । सह । मूरान् । कयादः । कय । अदः । मा । ते । हेत्याः । मुक्षत । दैव्यायाः ॥८०॥

Samveda - Mantra Number : 80
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 8;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अग्ने) परमात्मन् ! वा भौतिकाग्ने ! तू (यातुधानान्) राक्षसों वा प्राणदुःखदायी प्राणी प्रांर अप्राणियों को (सनात्) शीघ्र (मृणसि) नष्ट करता है (रक्षांसि) व राक्षस वा उक्त प्राणी अथवा अप्राणी (त्वा) तुझको (पुतनासु) संग्रामों में (न, जिग्युः) नहीं, जीत सकते हैं इसलिये — (कयादः) मांसभक्षक उन प्राणी वा अप्राणियों को (सहमूरान्) समूल (अनुदह) भस्म कर (त) वे (देव्यायाः, हेत्याः) दैवी, वज्र से (मा, मुक्षत) न, बचें।
मनुष्यों को शिक्षा है कि वे सम्पूर्ण दुष्ट प्राणियों वा अप्राणियों से [जो वायु आदि में विकार होकर रोग और मृत्यु के कारण होते हैं] बचने के लिये परमेश्वर की प्रार्थना और अग्नि में होम तथा आग्नेयास्त्रादि का प्रयोग करें, जिससे वे दुष्ट समूल नष्ट हों और धर्मांत्माओं को सुख मिले। और यह भी जानना चाहिये कि वे दुष्ट उस देवी वज्र से बच नहीं सकते।
Footnote
निघण्टु २।१९॥ २।१७॥ २।२० इत्यादि के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋग्वेद १०। ८७। १९ में भी ठीक ऐसा ही पाठ है॥