Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 8

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- वत्सः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
आ꣡ ते꣢ व꣣त्सो꣡ मनो꣢꣯ यमत्पर꣣मा꣡च्चि꣢त्स꣣ध꣡स्था꣢त् । अ꣢ग्ने꣣ त्वां꣢ का꣢मये गि꣣रा꣢ ॥८॥

आ꣢ । ते꣣ । वत्सः꣢ । म꣡नः꣢꣯ । य꣣मत् । परमा꣢त् । चि꣣त् । सध꣡स्था꣢त् । स꣣ध꣢ । स्था꣣त् । अ꣡ग्ने꣢꣯ । त्वाम् । का꣣मये । गिरा꣢ ॥८॥

Mantra without Swara
आ ते वत्सो मनो यमत्परमाच्चित्सधस्थात् । अग्ने त्वां कामये गिरा ॥

आ । ते । वत्सः । मनः । यमत् । परमात् । चित् । सधस्थात् । सध । स्थात् । अग्ने । त्वाम् । कामये । गिरा ॥८॥

Samveda - Mantra Number : 8
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अग्ने) हे भौतिकाग्नी ! (गिरा) वाणी के सहित ( त्वाम् ) तुम को (कामये) कामना करता हूं । क्योंकि (ते) तुम से ही (वत्सः) बोलने वाला (मनः) मनरूप विद्युत् पदार्थ, (परमाच्चित्) उत्कृष्ट ( सधस्थात्) हृदयस्थान से ( आ—यमत्) फैलता है ॥
अर्थात् अग्नि की ही सहायता से मनरूप बिजुली हृदय से सम्पूर्ण शरीर में फैलती है और उसी से सब कोई बोल सकता है इसलिये प्रत्येक बोलने वाले को आग्नेय वाणी इन्द्रिय का उपयोग अच्छे प्रकार करना चाहिये और कामना करनी चाहिये कि वह वाणी रूप अग्नि मुझे प्राप्त हो । अग्नि और वाणी में क्या सम्बन्ध है सो मन्त्र ७ की व्याख्या में प्रमाणपूर्वक सिद्ध कर चुके हैं और जैसा कि शिक्षा में कहा है कि—आत्मा बुद्ध्यासमे०
“आत्मा बुद्धि से मिलकर अर्थों के बोलने की इच्छा से मन को युक्त करता है, मन देहस्थ अग्नि का ताडन करता है, वह अग्नि वायु को प्रेरित करता है, वायु उरःस्थल में विचरता हुआ मन्दस्वर को उत्पन्न करता है ।”
मूल श्लोक संस्कृत भाष्य पृष्ठ २८ पं० २३ में देखिये । ऋग्वेद (८।११।७ ) में ‘कामये’ के स्थान में ‘कामया’ ऐसा पाठान्तर और तदनुसार अर्थान्तर भी है। इस मन्त्र का द्रष्टा ऋषिवत्स नामक है और इस मन्त्र में भी वत्स पद आया है इसलिये कई लोग यह शंका करते हैं कि वत्स ऋषि ने ही यह मन्त्र बनाया है । परन्तु वेद में जो वत्स पद है वह ऋषिविशेष का नाम नहीं, किन्तु मन्त्र में वत्स पद देख कर ही उसके द्रष्टा ऋषि ने अपना नाम भी वत्स रख लिया, ऐसा समझना चाहिये । लोक में भी जब किसी के पुत्र का जन्म होता है तो उस के नाम रखने को किसी अपूर्व शब्द को नहीं उपजाया जाता किन्तु प्राचीन शब्दसमूह में से छाँटकर जो अपने को अच्छा लगता है सो नाम रख देते हैं । इसी प्रकार उक्त वत्स पद को अनादि अपौरुषेय वेद में से लेकर ऋषिविशेष ने वा उसके इष्ट-मित्रों ने उसका वत्स नाम रख दिया है । यह नहीं है कि वत्स ऋषि ने बनाया इससे उस मन्त्र में वत्स का नाम है । क्योंकि अन्य मन्त्रों में भी उन-उन मन्त्रों के द्रष्टा ऋषियों के नाम नहीं हैं तथा अपौरुषेय वेद वा उसका कोई मन्त्र किसी ऋषि का बनाया नहीं है, और वेद में वत्स शब्द का यौगिकार्थ “बोलने वाला” है । जैसा कि उणादि सूत्र ३ । ६२ संस्कृतभाष्य में लिखा है ॥
Footnote
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