Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 793

1875 Mantra
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
मि꣣त्रं꣢ व꣣य꣡ꣳ ह꣢वामहे꣣ व꣡रु꣢ण꣣ꣳ सो꣡म꣢पीतये । या꣢ जा꣣ता꣢ पू꣣त꣡द꣢क्षसा ॥७९३॥

मि꣣त्र꣢म् । मि꣣ । त्र꣢म् । व꣣य꣢म् । ह꣣वामहे । व꣡रु꣢꣯णम् । सो꣡म꣢꣯पीतये । सो꣡म꣢꣯ । पी꣣तये । या꣢ । जा꣡ता꣢ । पू꣣त꣡द꣢क्षसा । पू꣣त꣢ । द꣣क्षसा ॥७९३॥

Mantra without Swara
मित्रं वयꣳ हवामहे वरुणꣳ सोमपीतये । या जाता पूतदक्षसा ॥

मित्रम् । मि । त्रम् । वयम् । हवामहे । वरुणम् । सोमपीतये । सोम । पीतये । या । जाता । पूतदक्षसा । पूत । दक्षसा ॥७९३॥

Samveda - Mantra Number : 793
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(वयम्) हम याज्ञिक लोग (सोमपीतये) सोमपान के लिये (मित्रम्) प्राण और (वरुणम्) अपान को (हवामहे) पुकारते हैं। (या) जो दोनों (पूतदक्षमा) पवित्रबलयुक्त (जाता) हुए हैं “यज्ञ से” यह शेष है॥
जैसे मनुष्य के देह में देहरक्षार्थ प्राण अपान हैं, वैसे इस ब्रह्माण्ड में भी प्राण अपान हैं। सोमादि के होम से इनकी अवस्था सुधरने और प्रबल होने पर प्राणियों का उत्तम निर्वाह होता है।
Footnote
शतपथ १२। ४। ४। १२ निरुक्त १०। ३, १०। २१ निघण्टु ५। ४ के प्रमाण और ऋ० १। १३। ४ का पाठभेद संस्कृतभाष्य में देखिये॥