Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 792

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣡ग्ने꣢ दे꣣वा꣢ꣳ इ꣣हा꣡ व꣢ह जज्ञा꣣नो꣢ वृ꣣क्त꣡ब꣢र्हिषे । अ꣢सि꣣ हो꣡ता꣢ न꣣ ई꣡ड्यः꣢ ॥७९२॥

अ꣡ग्ने꣢꣯ । दे꣣वा꣢न् । इ꣣ह꣢ । आ । व꣣ह । जज्ञानः꣢ । वृ꣣क्त꣡ब꣢र्हिषे । वृ꣣क्त꣢ । ब꣡र्हिषे । अ꣡सि꣢꣯ । हो꣡ता꣢꣯ । नः꣣ । ई꣡ड्यः꣢꣯ ॥७९२॥

Mantra without Swara
अग्ने देवाꣳ इहा वह जज्ञानो वृक्तबर्हिषे । असि होता न ईड्यः ॥

अग्ने । देवान् । इह । आ । वह । जज्ञानः । वृक्तबर्हिषे । वृक्त । बर्हिषे । असि । होता । नः । ईड्यः ॥७९२॥

Samveda - Mantra Number : 792
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अग्ने) हे अग्नि ! वा परमेश्वर ! (देवान्) वायु आदि देवों वा शीलसन्तोषादि उत्तम दिव्यगुणों को (इह) इस यज्ञ में वा ध्यानयोग यज्ञ में (आवह) प्राप्त करा। (वृक्तबर्हिषे) यथार्थ आसन रचने वाले यजमान वा योगी के लिये (जज्ञानः) अरणियों में प्रकट वा हृदयकमल में साक्षात् हुआ (नः) हमारा (होता) होम का सिद्ध करने वाला वा कर्मफलदाता (ईड्यः) प्रशंसनीय (असि) है॥
Footnote
विवरणकार कहते हैं कि “आग्नेय आज्य कहा गया”॥ ऋ० १। १२। ३ में भी॥