Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 78

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣢ स꣣म्रा꣢ज꣣म꣡सु꣢रस्य प्रश꣣स्तं꣢ पु꣣ꣳसः꣡ कृ꣢ष्टी꣣ना꣡म꣢नु꣣मा꣡द्य꣢स्य । इ꣡न्द्र꣢स्येव꣣ प्र꣢ त꣣व꣡स꣢स्कृ꣣ता꣡नि꣢ व꣣न्द꣡द्वा꣢रा꣣ व꣡न्द꣢माना विवष्टु ॥७८॥

प्र꣢ । स꣣म्रा꣡ज꣢म् । स꣣म् । रा꣡ज꣢꣯म् । अ꣡सु꣢꣯रस्य । अ । सु꣣रस्य । प्रशस्त꣢म् । प्र꣣ । शस्त꣢म् । पुँ꣣सः꣢ । कृ꣣ष्टीना꣢म् । अ꣣नुमा꣡द्य꣢स्य । अ꣣नु । मा꣡द्य꣢꣯स्य । इ꣡न्द्र꣢꣯स्य । इ꣣व । प्र꣢ । त꣣व꣡सः꣢ । कृ꣣ता꣡नि꣢ । व꣣न्द꣡द्वा꣢रा । व꣡न्द꣢꣯माना । वि꣣वष्टु ॥७८॥

Mantra without Swara
प्र सम्राजमसुरस्य प्रशस्तं पुꣳसः कृष्टीनामनुमाद्यस्य । इन्द्रस्येव प्र तवसस्कृतानि वन्दद्वारा वन्दमाना विवष्टु ॥

प्र । सम्राजम् । सम् । राजम् । असुरस्य । अ । सुरस्य । प्रशस्तम् । प्र । शस्तम् । पुँसः । कृष्टीनाम् । अनुमाद्यस्य । अनु । माद्यस्य । इन्द्रस्य । इव । प्र । तवसः । कृतानि । वन्दद्वारा । वन्दमाना । विवष्टु ॥७८॥

Samveda - Mantra Number : 78
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 8;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
ईश्वर उपदेश करता है कि हे मनुष्य ! भवान् [आप] (सम्राजम्) प्रकाशमान (असुरस्य) प्राणप्रद (पुंसः) पौरुषयुक्त (कृष्टीनाम्, अनुमाद्यस्य) मनुष्यों के, अनुमोदनीय (तवसः) बलवान् (इन्द्रस्येव) सूर्य के, जैसे (वन्दद्वारा) प्रशंसाप्रमुख (वन्दमाना) प्रशंसनीय (प्र, कृतानि) स्वाभाविक कर्म हैं [वैसे – प्रकरण से अग्नि वा परमात्मा के] (प्रशस्तम्) उत्तम कर्मों को (प्र, विवष्टु) अधिकता से कामना करिये॥
अर्थात् जैसे प्रत्यक्ष सूर्य प्रकाशमान हो रहा है, प्रारण को दे रहा है, [क्योंकि सूर्य द्वारा ही प्राणवायु का संचार होता है] धारणाकर्षणादि पुरुषार्थं युक्त है, मनुष्यों का मोदजनक अनुमोदन योग्य है और अत्यन्त बलवान् है और जैसे इस सूर्य के प्रशंसार्ह स्वाभाविक कर्म हैं, वैसे ही अग्नि के गुण कर्म भी कामना करने योग्य हैं तथा परमात्मा जो इन दोनों में इन गुणों का नियमपूर्वक रखने वाला तथा असीम भाव से उक्त गुणों का धर्त्ता है क्योंकि सूर्य्यादि धारकों का भी धारक, प्रकाशकों का प्रकाशक, प्राणप्रदों का प्राणप्रद, वीरों का वीर्यप्रद, मनुष्यों का परमानुमोदनीय, बलवानों का बलदाता है, उसके अतुल प्रशस्त गुणों की कामना करो॥
Footnote
निघण्टु २।६ आदि के प्रमाण तथा ऋग्वेद ७।६।१ में जो पाठान्तर है वह संस्कृतभाष्य में देखिये॥