Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 756

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अवत्सारः काश्यपः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣य꣡ꣳ सूर्य꣢꣯ इवोप꣣दृ꣢ग꣣य꣡ꣳ सरा꣢꣯ꣳसि धावति । स꣣प्त꣢ प्र꣣व꣢त꣣ आ꣡ दिव꣢꣯म् ॥७५६॥

अ꣣य꣢म् । सू꣡र्यः꣢꣯ । इ꣣व । उपदृ꣢क् । उ꣣प । दृ꣢क् । अ꣣य꣢म् । स꣡रा꣢꣯ꣳसि । धा꣣वति । स꣣प्त꣢ । प्र꣣व꣡तः꣢ । आ । दि꣡व꣢꣯म् ॥७५६॥

Mantra without Swara
अयꣳ सूर्य इवोपदृगयꣳ सराꣳसि धावति । सप्त प्रवत आ दिवम् ॥

अयम् । सूर्यः । इव । उपदृक् । उप । दृक् । अयम् । सराꣳसि । धावति । सप्त । प्रवतः । आ । दिवम् ॥७५६॥

Samveda - Mantra Number : 756
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अयम्) यह सोम (सूर्य इव) सूर्यसा (उपट्टक्) नेत्र सहायक है। (अयम्) यह सोम (सरांसि) ३० उक्थ पात्रों अथवा महीने के ३० दिनों को तथा (सप्त) सात ७ (प्रवतः) नदियों रूप भूरादिकों को (आदिषम्) द्युलोक पर्यन्त (धावति) जाता है।
Footnote
निरुक्तकार यास्क ५। ११ में कहते हैं कि — “याज्ञिक लोग तो ‘सरांसि’ पद से ३० उक्थपात्रों का अर्थ हैं जो कि माध्यन्दिन सवन में एक देवता वाले होते हैं और जिनको उस समय में एक प्रतिधान से पीते हैं। तथा नैरुक्तों की यह सम्मति है कि ३० अपरपक्ष के अहोरात्र और ३० पूर्व पक्ष के अहोरात्र हैं। जो कि चन्द्रमा से आने वाले जल हैं, उनको किरणें अपरपक्ष में पीती हैं। तथा हि (यमक्षि०) यह वेद में कहा है। उसको पूर्व पक्ष में आप्यायित करती हैं, जैमा कि — (यथा देवाः) वेद में कहा है।”
ऋ ९। ५४। २ में भी॥