Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 754

1875 Mantra
Devata- अश्विनौ Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
यु꣣वं꣢ चि꣣त्रं꣡ द꣢दथु꣣र्भो꣡ज꣢नं नरा꣣ चो꣡दे꣢थाꣳ सू꣣नृ꣡ता꣢वते । अ꣣र्वा꣢꣫ग्रथ꣣ꣳ स꣡म꣢नसा꣣ नि꣡ य꣢च्छतं꣣ पि꣡ब꣢तꣳ सो꣣म्यं꣡ मधु꣢꣯ ॥७५४॥

यु꣣व꣢म् । चि꣣त्र꣢म् । द꣣दथुः । भो꣡ज꣢꣯नम् । न꣣रा । चो꣡दे꣢꣯थाम् । सू꣣नृ꣡ता꣢वते । सु꣣ । नृ꣡ता꣢꣯वते । अ꣡र्वा꣢क् । र꣡थ꣢꣯म् । स꣡म꣢꣯नसा । स । म꣣नसा । नि꣢ । य꣡च्छतम् । पि꣡ब꣢꣯तम् । सो꣣म्य꣢म् । म꣡धु꣢꣯ ॥७५४॥

Mantra without Swara
युवं चित्रं ददथुर्भोजनं नरा चोदेथाꣳ सूनृतावते । अर्वाग्रथꣳ समनसा नि यच्छतं पिबतꣳ सोम्यं मधु ॥

युवम् । चित्रम् । ददथुः । भोजनम् । नरा । चोदेथाम् । सूनृतावते । सु । नृतावते । अर्वाक् । रथम् । समनसा । स । मनसा । नि । यच्छतम् । पिबतम् । सोम्यम् । मधु ॥७५४॥

Samveda - Mantra Number : 754
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(नरा) सब जगत् के नेता ! (समनसा) समान मन वाले सूर्य और चन्द्रमा ! (युवम्) तुम दोनों (सूनृतावते) वैदिकवाणी वाले यज्ञानुष्ठान सम्पन्न पुरुष के लिए (चित्रम्) अनेक प्रकार का (भोजनम्) भोजन (ददथुः) देते हो, (चोदेथाम्) कर्म में प्रवृत्त करते हो, (अर्वाक्) जगत् के सामने (रथम्) अपने रमणीय स्वरूप को (नियच्छतम्) नियमपूर्वक लाते हो। सो तुम दोनों (सोम्यम्) सोम का (मधु) रस (पिबतम्) शोषण करो॥
सूर्य चन्द्रमा शीतोष्ण से जगत् के निर्वाहक हैं। ओषधि वनस्पत्यादि रूप भोजन सबके लिये देते हैं। प्रकाश से जगत् को व्यापार में प्रवृत्त करते हैं और सोमादि औषधियों के रस को पीकर जगत् का उपकार करते हैं। जिस प्रकार मनुष्यादि के भीतरी बलसाधन का नाम मन हैं, इसी प्रकार सूर्य चन्द्र के आन्तरिक बलसाधन को यहां मन जानिये॥
Footnote
ऋ० ७। ७४। २ में भी॥