Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 74

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- वत्सप्रिर्भालन्दनः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣢ भू꣣र्ज꣡य꣢न्तं म꣣हां꣡ वि꣢पो꣣धां꣢ मू꣣रै꣡रमू꣢꣯रं पु꣣रां꣢ द꣣र्मा꣡ण꣢म् । न꣡य꣢न्तं गी꣣र्भि꣢र्व꣣ना꣡ धियं꣢꣯ धा꣣ ह꣡रि꣢श्मश्रुं꣣ न꣡ वर्मणा꣢꣯ धन꣣र्चि꣢म् ॥७४॥

प्र꣢ । भूः꣣ । ज꣡य꣢꣯न्तम् । म꣣हा꣢म् । वि꣣पोधा꣢म् । वि꣣पः । धा꣢म् । मू꣣रैः꣢ । अ꣡मू꣢꣯रम् । अ꣢ । मू꣣रम् । पुरा꣢म् । द꣣र्मा꣡ण꣢म् । न꣡य꣢꣯न्तम् । गी꣣र्भिः꣢ । व꣣ना꣢ । धि꣡य꣢꣯म् । धाः꣢ । ह꣡रि꣢꣯श्मश्रुम् । ह꣡रि꣢꣯ । श्म꣣श्रुम् । न꣢ । व꣡र्म꣢꣯णा । ध꣣नर्चि꣢म् ॥७४॥

Mantra without Swara
प्र भूर्जयन्तं महां विपोधां मूरैरमूरं पुरां दर्माणम् । नयन्तं गीर्भिर्वना धियं धा हरिश्मश्रुं न वर्मणा धनर्चिम् ॥

प्र । भूः । जयन्तम् । महाम् । विपोधाम् । विपः । धाम् । मूरैः । अमूरम् । अ । मूरम् । पुराम् । दर्माणम् । नयन्तम् । गीर्भिः । वना । धियम् । धाः । हरिश्मश्रुम् । हरि । श्मश्रुम् । न । वर्मणा । धनर्चिम् ॥७४॥

Samveda - Mantra Number : 74
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 8;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
हे मनुष्य ! तू (जयन्तम्) जीतने वाले (महाम्) बड़े (विपोधाम्) बुद्धिमानों के धारक रक्षक (अमूरम्) बन्धनरहित (पुराम्, मूरैः, दर्माणम्) दुर्गों का, मूल सहित विदारण करने वाले (वना, नयन्तम्) चिनगारियों को, ले जाने वाले (हरिश्मश्रुं न) सूर्य की किरण के समान तेजस्वी (धनर्चिम्) अग्नि को तथा (धियम्) पुरुषार्थ को (गीर्भिः) वेदवचनानुसार (वर्मणा) कवच के साथ (धाः) धारण कर और (प्र, भूः) समर्थ हो। राजा और योद्धाओं को योग्य है कि युद्ध में कवच पहनकर, आग्नेयास्त्र का प्रयोग करें, जिससे अपना विजय, बुद्विमान् पुरुषों की रक्षा, शत्रु दुर्गों का दलन हो और सामर्थ्य बढ़े। क्योंकि अग्नि सूर्यकिरण के समान सीधी रेखा में चिनगारियों सहित गोलों द्वारा उक्त कार्य सिद्ध कर सकता है।
निघण्टु ३।१५॥ १। ५॥ २१॥ उगादि ४।१०८ के प्रमाण तथा ॠग्वेद १०।४६।५ में जितना पाठ और अर्थ का भी भेद है वह संस्कृतभाष्य में देखिये॥
भाषार्थ :— हे स्तोता ! तुम, असुर सेना के जेता, षोडशकलावतार, मेधावी भक्तों के धारक, मुरुदैत्य के सेनाजनों से, पूर्ण प्रकार आदि के, विदारक, दैत्य के पाशों से निर्मुमुक्त षोडश सहस्र कन्याओं के स्तोत्र, और कवचों के द्वारा, उनके निवासस्थानों को, द्वारिका में पहुँचाने वाले, और धन दान से द्वारिकावासियों के पूजक, विष्णु नाम अग्नि के स्तुति करने को समर्थ हो और सेवा रूप कर्म को, विधान करो॥
Footnote
पं० ज्वालाप्रसाद भार्गव (आगरा) का संस्कृत और भाषाभाष्य देखिये जैसा कि अक्षरशः ऊपर छपा है। सब जानते हैं कि इस काण्ड का नाम आग्नेय काण्ड है। और इस मन्त्र में कहीं भी मूल में विष्णु १६ कलावतार दैत्य—पाश—१६००० कन्या-द्वारिका इत्यादिका नाम लेशमात्र भी नहीं है। यदि इस प्रकार के वेदार्थदूषक निर्मूल भाष्य वेदों पर न हुए होते तो क्यों वैदिक धर्म का इतना ह्रास होता और क्यों उस ह्रास के निवारणार्थ हमको भाष्य करने की आवश्यकता पड़ती॥