Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 735

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
नृ꣡भि꣢र्धौ꣣तः꣢ सु꣣तो꣢꣫ अश्नै꣣र꣢व्या꣣ वा꣢रैः꣣ प꣡रि꣢पूतः । अ꣢श्वो꣣ न꣢ नि꣣क्तो꣢ न꣣दी꣡षु꣢ ॥७३५॥

नृ꣡भिः꣢꣯ । धौ꣣तः꣢ । सु꣣तः꣢ । अ꣡श्नैः꣢꣯ । अ꣡व्याः꣢꣯ । वा꣡रैः꣢꣯ । प꣡रि꣢꣯पूतः । प꣡रि꣢꣯ । पू꣣तः । अ꣡श्वः꣢꣯ । न । नि꣣क्तः꣢ । न꣣दी꣡षु꣢ ॥७३५॥

Mantra without Swara
नृभिर्धौतः सुतो अश्नैरव्या वारैः परिपूतः । अश्वो न निक्तो नदीषु ॥

नृभिः । धौतः । सुतः । अश्नैः । अव्याः । वारैः । परिपूतः । परि । पूतः । अश्वः । न । निक्तः । नदीषु ॥७३५॥

Samveda - Mantra Number : 735
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(नृभिः) कर्म के नेता ऋत्विजों से (धौतः) धोया हुआ फिर (अश्मैः) अश्मा=पत्थरों से (सुतः) छेत कर निचोड़ा हुआ और (अव्यावारैः) ऊर्णामय दशापवित्रों से (परिपूतः) सर्वथा स्वच्छ किया हुआ सोम है (न) जैसा (नदीषु) नदियों में (निक्तः) स्नान कराया हुआ (अश्वः) घोड़ा॥ (तम्) उस सोम को (ते) आपके लिये (श्रीणन्तः) दुग्धादि में मिलाकर पकाते हुए हम लोग (स्वादुम्) स्वाद (अकर्म) बनाते हैं। दृष्टान्त = (यथा) जैसे (गोभिः) गौवों के लिये (यवत्) यवादि से सिद्ध किया दलिया आदि भोज्य स्वादु बनाते हैं तद्वत् (इन्द्र) हे राजन् ! यजमान ! (अस्मिन्) इस (सधमादे) यज्ञ में (त्वा) आपको ‘हम सोम पिलाते हैं’ यह शेषार्थ है।
जिन घटों में सोम ग्रहण किया गया हो वे घट “ग्रह” कहाते हैं। और वे (ग्रह) प्रातःसवन में “उपांशु” आदि, माध्यन्दिन सवन में “मरुत्वतीयादि”, तृतीयसवन वा सायं सवन में “आदित्यादि” संज्ञक होते हैं। इनके अतिरिक्त षोडशी आदि यज्ञों में बहुत से “षोडशी” संज्ञकादि (ग्रह) घट होते हैं। इन सबके अतिरिक्त एक “अदाभ्य” नामक ग्रह होता है, और यह वह ग्रह है कि जिस गूलर की लकड़ी के पात्र में सोम रखा हो, उसमें होता के चमसे वाले “निग्राभ्या” नामक जल लेकर उसमें तीन सोमलताखण्ड डाल कर “अग्नये त्वा०” (यजुः ८। ४७) इत्यादि तीन मन्त्रों से क्रम से ग्रहण किया जाता है। ऐसा ही कात्यायन ने १२। ५। १३-१५ में कहा गया है कि “अदाभ्यं गृह्णाति०” इत्यादि॥
Footnote
अष्टाध्यायी २। ४। ८० का प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥
ऋ० ८। २। २—३ में (अव्योवारैः) पाठान्तर है॥