Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 733

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- त्रिशोकः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ꣣ह꣢ त्वा꣣ गो꣡प꣢रीणसं म꣣हे꣡ म꣢न्दन्तु꣣ रा꣡ध꣢से । स꣡रो꣢ गौ꣣रो꣡ यथा꣢꣯ पिब ॥७३३॥

इह꣢ । त्वा꣣ । गो꣡प꣢꣯रीणसम् । गो । प꣣रीणसम् । महे꣣ । म꣣न्दन्तु । रा꣡ध꣢꣯से । स꣡रः꣢꣯ । गौ꣣रः꣢ । य꣡था꣢꣯ । पि꣢ब ॥७३३॥

Mantra without Swara
इह त्वा गोपरीणसं महे मन्दन्तु राधसे । सरो गौरो यथा पिब ॥

इह । त्वा । गोपरीणसम् । गो । परीणसम् । महे । मन्दन्तु । राधसे । सरः । गौरः । यथा । पिब ॥७३३॥

Samveda - Mantra Number : 733
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(गोपरीणसम्) किरणों से मिले हुए (त्वा) तुझ इन्द्र को (इह) इस यज्ञ में (महे) बड़े (राधसे) अन्नादि धन के लिये [वृष्टि द्वारा] (मन्दन्तु) मनुष्य सोम से हृष्ट अर्थात् वृष्टि आदि स्वकार्य करने में अनुकूल करें। और तू (पिब) उस सोम को शोष। दृष्टान्त — (यथा) जैसे (गौरः) गौर मृग (सरः) सोमरस जल को पीता है तद्वत्॥
Footnote
निघण्टु १। ४॥ २। १० के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥