Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 732

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- त्रिशोकः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
मा꣡ त्वा꣢ मू꣣रा꣡ अ꣢वि꣣ष्य꣢वो꣣ मो꣢प꣣ह꣡स्वा꣢न꣣ आ꣡ द꣢भन् । मा꣡ कीं꣢ ब्रह्म꣣द्वि꣡षं꣢ वनः ॥७३२॥

मा । त्वा꣣ । मूराः꣢ । अ꣣विष्य꣡वः꣢ । मा । उ꣣प꣡ह꣢स्वानः । उप । ह꣡स्वा꣢꣯नः । आ । द꣣भन् । मा꣢ । की꣣म् । ब्रह्मद्वि꣡ष꣢म् । ब्र꣣ह्म । द्वि꣡ष꣢꣯म् । व꣣नः ॥७३२॥

Mantra without Swara
मा त्वा मूरा अविष्यवो मोपहस्वान आ दभन् । मा कीं ब्रह्मद्विषं वनः ॥

मा । त्वा । मूराः । अविष्यवः । मा । उपहस्वानः । उप । हस्वानः । आ । दभन् । मा । कीम् । ब्रह्मद्विषम् । ब्रह्म । द्विषम् । वनः ॥७३२॥

Samveda - Mantra Number : 732
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अविष्यवः) भोजनभट्ट लोग [निघं० २।८] जो कि (उपहस्वानः) उपहास करने वाले और (मूराः) मूढ हैं (त्वा) तुझको (मा दभन्) न हिंसित करें और तू भी (ब्रह्मद्विषम्) वेद के द्वेष करने वाले को (मा कीम्) मत (वनः) भज॥
अर्थात् इन्द्रयागादि कर्मानुष्ठान के विरोधी, स्वार्थी, मूढ़ लोग यज्ञ के नाश से वृष्टिकारक इन्द्र के विधायक न हों और इन्द्र से उन्हें अनुकूल्य भी न हो। यह परमात्मा का अनुग्रह प्रार्थित है॥
Footnote
ऋ० ८। ४५। २३ में भी॥