Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 726

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- इरिम्बिठिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
शा꣡चि꣢गो꣣ शा꣡चि꣢पूजना꣣य꣡ꣳ रणा꣢꣯य ते सु꣣तः꣢ । आ꣡ख꣢ण्डल꣣ प्र꣡ हू꣢यसे ॥७२६॥

शा꣡चि꣢꣯गो । शा꣡चि꣢꣯ । गो꣣ । शा꣡चि꣢꣯पूजन । शा꣡चि꣢꣯ । पू꣣जन । अय꣢म् । र꣡णा꣢꣯य । ते꣣ । सुतः꣢ । आ꣡ख꣢꣯ण्डल । प्र । हू꣡यसे ॥७२६॥

Mantra without Swara
शाचिगो शाचिपूजनायꣳ रणाय ते सुतः । आखण्डल प्र हूयसे ॥

शाचिगो । शाचि । गो । शाचिपूजन । शाचि । पूजन । अयम् । रणाय । ते । सुतः । आखण्डल । प्र । हूयसे ॥७२६॥

Samveda - Mantra Number : 726
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(शाचिगो) समर्थ किरणयुक्त (शाचिपूजन) किरणों के समर्थक (आखण्डल) मेघ के अवयवों को खण्ड-खण्ड करने वाले सूर्य ! (अयम्) यह सोम (ते) तेरे (रणाय) मेघों के साथ संग्राम और विजय के लिये (सुतः) खींचकर रक्खा है। (प्रहूयसे) और आह्वान वा वर्णन किया जाता है।
अर्थात् सूर्य की किरणें समर्थ हैं और सूर्य उनका समर्थक है। इसलिये सूर्य और मेघ के युद्ध में सूर्य के विजय अर्थात् वृष्टि के लिये सोम से यज्ञ करना चाहिये॥
Footnote
ऋ० ८। १७। १२ में भी॥