Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 723

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- श्रुतकक्षः सुकक्षो वा आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
य꣢स्मि꣣न्वि꣢श्वा꣣ अ꣢धि꣣ श्रि꣢यो꣣ र꣡ण꣢न्ति स꣣प्त꣢ स꣣ꣳस꣡दः꣢ । इ꣡न्द्र꣢ꣳ सु꣣ते꣡ ह꣢वामहे ॥७२३॥

य꣡स्मि꣢꣯न् । वि꣡श्वा꣢꣯ । अ꣡धि꣢꣯ । श्रि꣡यः꣢꣯ । र꣡ण꣢꣯न्ति । स꣣प्त꣢ । स꣣ꣳस꣡दः꣢ । स꣣म् । स꣡दः꣢꣯ । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । सु꣡ते꣢ । ह꣣वामहे ॥७२३॥

Mantra without Swara
यस्मिन्विश्वा अधि श्रियो रणन्ति सप्त सꣳसदः । इन्द्रꣳ सुते हवामहे ॥

यस्मिन् । विश्वा । अधि । श्रियः । रणन्ति । सप्त । सꣳसदः । सम् । सदः । इन्द्रम् । सुते । हवामहे ॥७२३॥

Samveda - Mantra Number : 723
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(सप्त) सात ७ (संसदः) योगभूमियों में आसन जमाने वाले पुरुष (यस्मिन्) जिस परमेश्वर में (विश्वाः) सव (श्रियः) लोग लक्ष्मियों को (अधि रणन्ति) अधिकता से वर्णित करते हैं (सुते) मन शुद्ध होने पर (इन्द्रम्) उस परमेश्वर को (हवामहे) हम पुकारते हैं।
अथवा—(सप्त संसदः) सात ऋत्विज् = ३ उद्गाता, ४ होता, ५ मैत्रावरुण, ६ ब्राह्मणाच्छंसी, ७ अच्छावाक (यस्मिन्) जिस सोम में (विश्वाः) सब (श्रियः) सौभाग्यलक्ष्मियों को (अधिरणन्ति) अधिकता मे बताते हैं (सुते) उस सोम के सम्पन्न अभिषुत हो जाने पर (इन्द्रम्) वृष्टिकारक भौतिक देवविशेष को (हवामहे) हम प्रशंसित करते हैं।
Footnote
ऋ० ८। ९२। २० में भी॥