Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 720

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेधातिथिः काण्वः प्रियमेधश्चाङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
न꣡ घे꣢म꣣न्य꣡दा प꣢꣯पन꣣ व꣡ज्रि꣢न्न꣣प꣢सो꣣ न꣡वि꣢ष्टौ । त꣢꣯वेदु꣣ स्तो꣡मै꣢श्चिकेत ॥७२०॥

न꣢ । घ꣣ । ईम् । अन्य꣢त् । अ꣣न् । य꣢त् । आ । प꣣पन । व꣡ज्रि꣢꣯न् । अ꣣प꣡सः꣢ । न꣡वि꣢꣯ष्टौ । त꣡व꣢꣯ । इत् । उ꣣ । स्तो꣡मैः꣢꣯ । चि꣣केत ॥७२०॥

Mantra without Swara
न घेमन्यदा पपन वज्रिन्नपसो नविष्टौ । तवेदु स्तोमैश्चिकेत ॥

न । घ । ईम् । अन्यत् । अन् । यत् । आ । पपन । वज्रिन् । अपसः । नविष्टौ । तव । इत् । उ । स्तोमैः । चिकेत ॥७२०॥

Samveda - Mantra Number : 720
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(वज्रिन्) हे दुष्टनिबर्हण ! नियन्तः ! परमेश्वर ! मैं (अपसः) कर्मकाण्ड के (नविष्टौ) नवीन यज्ञ [आरम्भ] में (अन्यत्) आप को छोड़ अन्य की (न घ ईम्) नहीं ही (आपपन) स्तुति करता हूँ (उ) क्योंकि (तव इत्) आपके ही (स्तोमै)) स्तोत्रों से (चिकेत) ज्ञान पाता हूँ॥
ज्ञानलाभ के लिये मनुष्यों को परमात्मा का परित्याग करके अन्य की स्तुति नहीं करनी चाहिये॥
Footnote
व्याकरण और निघण्टु ३। १४ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥
ऋग्वेद ८। २। १७ में भी॥