Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 717

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
श꣢꣫ꣳसेदु꣣क्थ꣢ꣳ सु꣣दा꣡न꣢व उ꣣त꣢ द्यु꣣क्षं꣢꣫ यथा꣣ न꣡रः꣢ । च꣣कृमा꣢ स꣣त्य꣡रा꣢धसे ॥७१७॥

श꣡ꣳस꣢꣯ । इत् । उ꣣क्थ꣢म् । सु꣣दा꣡न꣢वे । सु꣣ । दा꣡न꣢वे । उ꣡त꣢ । द्यु꣣क्ष꣢म् । द्यु꣣ । क्ष꣢म् । य꣡था꣢꣯ । न꣡रः꣢꣯ । च꣣कृम꣢ । स꣣त्य꣡रा꣢धसे । स꣣त्य꣢ । रा꣣धसे ॥७१७॥

Mantra without Swara
शꣳसेदुक्थꣳ सुदानव उत द्युक्षं यथा नरः । चकृमा सत्यराधसे ॥

शꣳस । इत् । उक्थम् । सुदानवे । सु । दानवे । उत । द्युक्षम् । द्यु । क्षम् । यथा । नरः । चकृम । सत्यराधसे । सत्य । राधसे ॥७१७॥

Samveda - Mantra Number : 717
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(यथा) जिस प्रकार (नरः) हम कर्मकाण्ड के नायक लोग (सत्यराधसे, सुदानवे) सत्य जिसका धन है, जो शोभन दानी है उस इन्द्र=परमात्मा के लिये (द्युक्षम्) प्रकाश का साधनभूत (उक्थम्) स्तोत्र (चकृम) करते हैं (उत) ऐसे ही (शंस) तू भी उच्चारण कर (इत्) पादपूरणार्थ है।
अर्थात् मनुष्यों को परस्परोपदेश से परमेश्वर की स्तुति प्रार्थना उपासना का प्रचार करना चाहिये, जिससे ज्ञानप्रकाश बढ़े॥
Footnote
निघ० १। ९ का प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋ० ७। ३१। में भी॥