Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 71

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- त्रिशिरास्त्वाष्ट्रः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣢ के꣣तु꣡ना꣢ बृह꣣ता꣡ या꣢त्य꣣ग्नि꣡रा रोद꣢꣯सी वृष꣣भो꣡ रो꣢रवीति । दि꣣व꣢श्चि꣣द꣡न्ता꣢दुप꣣मा꣡मुदा꣢꣯नड꣣पा꣢मु꣣पस्थे꣢ महि꣣षो꣡ व꣢वर्ध ॥७१॥

प्र꣢ । के꣣तु꣡ना꣢ । बृ꣣हता꣢ । या꣣ति । अग्निः꣢ । आ । रो꣡द꣢꣯सी꣣इ꣡ति꣢ । वृ꣣षभः꣢ । रो꣣रवीति । दिवः꣢ । चि꣣त् । अ꣡न्ता꣢꣯त् । उ꣣पमा꣢म् । उ꣣प । मा꣢म् । उत् । आ꣣नट् । अपा꣢म् । उ꣣प꣡स्थे꣢ । उ꣣प꣡ । स्थे꣣ । महिषः꣢ । व꣣वर्ध ॥७१॥

Mantra without Swara
प्र केतुना बृहता यात्यग्निरा रोदसी वृषभो रोरवीति । दिवश्चिदन्तादुपमामुदानडपामुपस्थे महिषो ववर्ध ॥

प्र । केतुना । बृहता । याति । अग्निः । आ । रोदसीइति । वृषभः । रोरवीति । दिवः । चित् । अन्तात् । उपमाम् । उप । माम् । उत् । आनट् । अपाम् । उपस्थे । उप । स्थे । महिषः । ववर्ध ॥७१॥

Samveda - Mantra Number : 71
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 7;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अग्निः) अग्नि (बृहता, केतुना) बड़ी लपट से (दिवः, चित्) द्युलोक के, भी (अन्तात्) पर्यन्त तक (प्र, याति) जाता है। (रोदसी) द्यावाभूमियों के मध्य में (आ) अभिव्याप्त होकर (वृषभः) वृष्टि का हेतु (रोरवीति) गर्जता है। (अपाम्, उपस्थे) मेघस्थ जलों के उपस्थान अन्तरिक्ष में (उपमाम्) समीप (उदानट्) ऊपर को व्यापता है। इस प्रकार (महिषः) महान् (ववर्ध) बढ़ता है।
इस मन्त्र में अग्नि का माहात्म्य दिखलाया है कि यही अग्नि ऊपर जाकर अन्तरिक्ष द्युलोक और मेघ को व्याप्त करके स्थित है। मेघों में गर्जन और वर्षा का हेतु भी यही है। इत्यादि।
Footnote
उणादि १। ७४। निरुक्त ९। २२। निघण्टु २।१६॥ ३।३ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋग्वेद में १०।८।१ “दिवश्चिदन्तां उपमां उदान०” ऐसा पाठ है॥