Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 709

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- सौभरि: काण्व: Chhand- काकुभः प्रगाथः (विषमा ककुप्, समा सतोबृहती) Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
उ꣡प꣢ त्वा꣣ क꣡र्म꣢न्नू꣣त꣢ये꣣ स꣢ नो꣣ यु꣢वो꣣ग्र꣡श्च꣢क्राम꣣ यो꣢ धृ꣣ष꣢त् । त्वा꣡मिध्य꣢꣯वि꣣ता꣡रं꣢ व꣣वृ꣢म꣣हे स꣡खा꣢य इन्द्र सान꣣सि꣢म् ॥७०९॥

उ꣡प꣢꣯ । त्वा꣣ । क꣡र्म꣢꣯न् । ऊ꣣त꣡ये꣢ । सः । नः꣣ । यु꣡वा꣢꣯ । उ꣣ग्रः꣢ । च꣣क्राम । यः꣢ । धृ꣣ष꣢त् । त्वाम् । इत् । हि । अ꣣विता꣡र꣢म् । व꣣वृम꣡हे꣢ । स꣡खा꣢꣯यः । स । खा꣣यः । इन्द्र । सानसि꣣म् ॥७०९॥

Mantra without Swara
उप त्वा कर्मन्नूतये स नो युवोग्रश्चक्राम यो धृषत् । त्वामिध्यवितारं ववृमहे सखाय इन्द्र सानसिम् ॥

उप । त्वा । कर्मन् । ऊतये । सः । नः । युवा । उग्रः । चक्राम । यः । धृषत् । त्वाम् । इत् । हि । अवितारम् । ववृमहे । सखायः । स । खायः । इन्द्र । सानसिम् ॥७०९॥

Samveda - Mantra Number : 709
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्र) हे राजन् ! हम (कर्मन्) व्यवहार [मुकद्दमे] में (त्वा) आपके (उप) शरण में आते हैं। (यः) जो आप (धृषत्) हम पर अन्याय करने वालों का दण्डादि से दमन करते हैं (सः) वह आप (उग्रः) असह्य तेजस्वी (युवा) वीर पुरुष दृढ़ांग (नः) हमारी (ऊतये) रक्षा के लिये (चक्राम) दौरा करते हैं। अतः (सखायः) हम एक दूसरे के मित्र बनते हुए (सानसिम, अवितारम्, त्वाम्, इत् हि) संभजनीय रक्षक आप का, ही (ववृमहे) [राज्य के लिये] वरण करते हैं॥
प्रजावर्ग को चाहिए कि राजगद्दी के लिये ऐसे पुरुष का वरण करें जो कि व्यवहारों को सुने, देखे, दृढाङ्ग और दृढव्यवसाय हो, जिसकी उग्रता शत्रुओं को असह्य हो, जो राजभक्तों का सेवनीय और सबका रक्षक हो॥
Footnote
अष्टाध्यायी २। ४। ७३॥ ३। १। ८५ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥
ऋ० ८॥ २१। २ में भी॥