Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 707

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
न꣡ हि ते꣢꣯ पू꣣र्त꣡म꣢क्षि꣣प꣡द्भुव꣢꣯न्नेमानां पते । अ꣢था꣣ दु꣡वो꣢ वनवसे ॥७०७॥

न꣢ । हि । ते꣣ । पूर्त꣢म् । अ꣣क्षिप꣢त् । अ꣣क्षि । प꣢त् । भु꣡व꣢꣯त् । ने꣣मानाम् । पते । अ꣡थ꣢꣯ । दु꣡वः꣢꣯ । व꣣नवसे ॥७०७॥

Mantra without Swara
न हि ते पूर्तमक्षिपद्भुवन्नेमानां पते । अथा दुवो वनवसे ॥

न । हि । ते । पूर्तम् । अक्षिपत् । अक्षि । पत् । भुवत् । नेमानाम् । पते । अथ । दुवः । वनवसे ॥७०७॥

Samveda - Mantra Number : 707
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
पूर्व मन्त्र से [अग्ने] हे ज्ञानप्रकाशक ! (ते) आप का (पूर्तम्) पूर्ण और पूरक तेज (अक्षिपत्) हमारी आंख आदि ज्ञानेन्द्रियों का पतन कराने वाला (नहि)(भुवत्) होवे, किन्तु ज्ञान का वर्धक होवे (नेमानाम् पते) हे हम अल्पज्ञों के पालक वा स्वामिन् ! (अथ) इस प्रयोजन के लिये (दुवः) हमारी की हुई भक्ति को (वनवसे) स्वीकार कीजिये॥
(दुवः) यह परिचर्या भक्ति सेवा का नाम है।
Footnote
निघं० ३। ५॥ ऋ० ६। १४। १८ में भी॥