Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 706

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
य꣢त्र꣣꣬ क्व꣢꣯ च ते꣣ म꣢नो꣣ द꣡क्षं꣢ दधस꣣ उ꣡त्त꣢रम् । त꣢त्र꣣ यो꣡निं꣢ कृणवसे ॥७०६॥

य꣡त्र꣢꣯ । क्व꣢ । च꣣ । ते । म꣡नः꣢꣯ । द꣡क्ष꣢꣯म् । द꣣धसे । उ꣡त्त꣢꣯रम् । त꣡त्र꣢꣯ । यो꣡नि꣢꣯म् । कृ꣣णवसे ॥७०६॥

Mantra without Swara
यत्र क्व च ते मनो दक्षं दधस उत्तरम् । तत्र योनिं कृणवसे ॥

यत्र । क्व । च । ते । मनः । दक्षम् । दधसे । उत्तरम् । तत्र । योनिम् । कृणवसे ॥७०६॥

Samveda - Mantra Number : 706
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
हे अग्ने ! [पूर्व मन्त्र से अनुवृत्ति] परमात्मन् (ते) आप की (मनः) इच्छा [जीवात्मा को कर्मानुकूल फल देने की रुचि] (यत्र, क्व च) जिस किसी लोक में वा देश में होती है (तत्र) उसी देश वा लोक में (योनिम्) मनुष्यादि योनि (कृणवसे) जीवों को नियत कर देते हैं (उत्तरम्) उत्तम और (दक्षम्) बल भी (दधसि) धारण करते हो॥
प्राणिजन कर्मानुसार परमेश्वर के वश में रहकर अपने किये कर्मों के भोगार्थ उस-उस योनि को प्राप्त होते हैं यह भाव है। यद्यपि परमात्मा सर्वेन्द्रिय विवर्जित होने से मन रहित है तथापि सर्वेन्द्रिय गुणाभास० इत्यादि श्वेताश्वतरोपनिषत् के वचनानुसार मन शब्द का प्रयोग शुद्ध है कुछ दोष नहीं॥
Footnote
ॠग्वेद ६। १६। १७ पाठभेद संस्कृतभाष्य में देखिये।