Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 704

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhand- प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
ऊ꣣र्जो꣡ नपा꣢꣯त꣣ꣳ स꣢ हि꣣ना꣡यम꣢꣯स्म꣣यु꣡र्दाशे꣢꣯म ह꣣व्य꣡दा꣢तये । भु꣢व꣣द्वा꣡जे꣢ष्ववि꣣ता꣡ भुव꣢꣯द्वृ꣣ध꣢ उ꣣त꣢ त्रा꣣ता꣢ त꣣नू꣡ना꣢म् ॥७०४॥

ऊ꣡र्जः꣢ । न꣡पा꣢꣯तम् । सः । हि꣣न꣢ । अ꣣य꣢म् । अ꣣स्म꣢युः । दा꣡शे꣢꣯म । ह꣣व्य꣢꣯दातये । ह꣣व्य꣢ । दा꣣तये । भु꣡व꣢꣯त् । वा꣡जे꣢꣯षु । अ꣣वि꣢ता । भु꣡व꣢꣯त् । वृ꣣धे꣢ । उ꣣त꣢ । त्रा꣣ता꣢ । त꣣नू꣡ना꣢म् ॥७०४॥

Mantra without Swara
ऊर्जो नपातꣳ स हिनायमस्मयुर्दाशेम हव्यदातये । भुवद्वाजेष्वविता भुवद्वृध उत त्राता तनूनाम् ॥

ऊर्जः । नपातम् । सः । हिन । अयम् । अस्मयुः । दाशेम । हव्यदातये । हव्य । दातये । भुवत् । वाजेषु । अविता । भुवत् । वृधे । उत । त्राता । तनूनाम् ॥७०४॥

Samveda - Mantra Number : 704
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(स) वह प्रसिद्ध अग्नि, वा परमेश्वर (अस्मयुः) जाठराग्न्यादि भेद से वा भक्ति देखकर तुष्ट हो, हमको चाहने वाला (यम्) जिस (ऊर्जोनपातम्) बल के न गिराने वाले का [हम प्रशंसिषम् प्रशंसामः) वर्णन करते हैं, यह पूर्व मन्त्र से अनुवृत्ति है] और (हव्यदातये) वायु आदि देव निमित्त हव्य पहुँचाने वा कर्मफल पहुंचाने के लिये (दाशेम) हविष्य वा आत्मा का अर्पण करते हैं। वह अच्छे प्रकार हवन किया हुया अग्नि वा ध्यान किया हुआ परमात्मा (वाजेषु) अन्न जो भोजन किये गये उनके पच्यमान होते हुए (अविता) रक्षक (भुवत्) हो, (वृधे) शरीरादि की वृद्धि के लिए (भुवत्) हो, (उत) और (तनूनाम्) देहों का (त्राता) रक्षक हो।

भावार्थ:— जो मनुष्य अग्नि का भले प्रकार से उपयोग करना जानते हैं और होमादि में काम में लाते हैं वा परमेश्वर की उपासना करते हैं, उनका बल क्षीण नहीं होता, उनके अन्न का पचना, शरीरादि की वृद्धि और रक्षा होती है।
Footnote
ऋ० ६। ४८। २ में भी॥