Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 702

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कविर्भार्गवः Chhand- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
अ꣡व꣢ द्युता꣣नः꣢ क꣣ल꣡शा꣢ꣳ अचिक्रद꣣न्नृ꣡भि꣢र्येमा꣣णः꣢꣫ कोश꣣ आ꣡ हि꣢र꣣ण्य꣡ये꣢ । अ꣣भी꣢ ऋ꣣त꣡स्य꣢ दो꣣ह꣡ना꣢ अनूष꣣ता꣡धि꣢ त्रिपृ꣣ष्ठ꣢ उ꣣ष꣢सो꣣ वि꣡ रा꣢जसि ॥७०२॥

अ꣡व꣢꣯ । द्यु꣣तानः꣢ । क꣣ल꣡शा꣢न् । अ꣣चिक्रदत् । नृ꣡भिः꣢꣯ । ये꣣मानः꣢ । को꣡शे꣢꣯ । आ । हि꣣रण्य꣡ये꣢ । अ꣡भि꣢ । ऋ꣣त꣡स्य꣢ । दो꣣ह꣡नाः꣢ । अ꣣नूषत । अ꣡धि꣢꣯ । त्रि꣣पृष्ठः꣢ । त्रि꣣ । पृष्ठः꣢ । उ꣣ष꣡सः꣢ । वि । रा꣣जसि ॥७०२॥

Mantra without Swara
अव द्युतानः कलशाꣳ अचिक्रदन्नृभिर्येमाणः कोश आ हिरण्यये । अभी ऋतस्य दोहना अनूषताधि त्रिपृष्ठ उषसो वि राजसि ॥

अव । द्युतानः । कलशान् । अचिक्रदत् । नृभिः । येमानः । कोशे । आ । हिरण्यये । अभि । ऋतस्य । दोहनाः । अनूषत । अधि । त्रिपृष्ठः । त्रि । पृष्ठः । उषसः । वि । राजसि ॥७०२॥

Samveda - Mantra Number : 702
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
फिर सोम का वर्णन है कि — (द्युतानः) प्रकाशमान, (नृभिः) ऋत्विजों द्वारा (कलशान्) कलशों में से (अव येमानः) लौटा जाता हुआ—निकाला जाता हुआ, (हिरण्यये कोशे) सुवर्णमय कोश स्रुवादि में (आ) चारों ओर से विराजमान, (त्रिपृष्ठे अधि) प्रातः सवनादि तीनों सवनों में अधिकृत सोम, (उषसः) सूर्य किरणों को (विराजसि) विराजित करता है (अचिक्रदत्) और शब्द करता है [उस सोम की] (दोहनाः) दुहने वाले ऋत्विज् (अनूषत) प्रशंसा करते हैं॥
Footnote
“सोमकण्डन के पत्थर मानो बछड़े हैं और कण्डन करने वाले ऋत्विज् मानो दुहने वाले हैं” यह तैत्तिरीयक ब्राह्मण में ऋत्विजों को दोग्धा बताया गया है [सायण] अन्य व्याकरण के प्रमाण और ऋ० ९। ७५। ३ के पाठान्तर संस्कृतभाष्य में देखिये॥